अब घास नहीं, जंगल से लकड़ी भी ढो रही हैं ग्रामीण महिलाएं

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अब घास नहीं, जंगल से लकड़ी भी ढो रही हैं ग्रामीण महिलाएं

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हल्द्वानी में रसोई गैस की किल्लत के कारण ग्रामीण महिलाएं घास और लकड़ी इकट्ठा करने को मजबूर हो गई हैं। ‘उज्ज्वला योजना’ के तहत जो सुधार हुआ था, वह अब संकट में है। पुरुष भी अब घर में चूल्हा जलाने के लिए लकड़ियाँ लाने लगे हैं। वन विभाग को भी इस समस्या का सामना करना पड़ रहा है।

अब घास नहीं, जंगल से लकड़ी भी ढो रही हैं ग्रामीण महिलाएं

हल्द्वानी। शहरी इलाकों के साथ-साथ अब ग्रामीण क्षेत्रों में भी रसोई गैस (एलपीजी) का संकट गहराने लगा है। जिस ‘उज्ज्वला योजना’ ने कभी गांवों को धुआं-मुक्त करने का सपना दिखाया था, आज वही गांव फिर से पुराने दौर की ओर लौटते दिख रहे हैं। सिलेंडरों की किल्लत और आसमान छूती कीमतों के कारण ग्रामीण महिलाएं अब पशुओं के लिए घास जुटाने के साथ ही जंगल में लकड़ियों की तलाश में भटकने को मजबूर हैं। दमुवाढूंगा, पनियाली, फतेहपुर, मल्ला प्लाट, गौलापार, चोरगलिया, रानीबाग, सनकोट, मल्ला काठगोदाम, गौलाबैराज क्षेत्र आदि इलाकों में सुबह महिलाओं की टीम जंगल जाते हुए देखी जा सकती है।

बदल गई प्राथमिकता, पुरुषों ने भी संभाला मोर्चाआम तौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की सुबह पशुओं के लिए चारा जुटाने से शुरू होती थी, लेकिन अब उनकी चुनौतियां दोगुनी हो गई हैं। घास के गट्ठर के साथ अब लकड़ियों का बोझ भी उनके सिर पर नजर आने लगा है। हालात इतने विकट हैं कि केवल महिलाएं ही नहीं, बल्कि घर के पुरुष भी चूल्हा जलाने के लिए जंगल से लकड़ी ढो रहे हैं। कई गांवों में सुबह-शाम जंगल की ओर जाते परिवारों की लंबी कतारें इस ईंधन संकट की गवाह बन रही हैं।एलपीजी की चमक में बुझ गए गोबर गैस प्लांटग्रामीण क्षेत्रों में कभी लकड़ी के धुएं से निजात पाने के लिए ‘गोबर गैस प्लांट’ एक सशक्त विकल्प हुआ करते थे। सरकारी प्रोत्साहन से ग्रामीण पशुओं के गोबर का उपयोग कर पाइपलाइन के जरिए रसोई तक ईंधन पहुंचाते थे। धूप की गर्मी से तैयार होने वाली यह गैस खाना पकाने का सबसे सुलभ माध्यम थी। लेकिन एलपीजी सिलेंडरों की घर-घर पहुंच के बाद लोगों ने इन संयंत्रों को रखरखाव के अभाव में बंद कर दिया। आज जब गैस सिलेंडर पहुंच से बाहर हो रहे हैं, तो ग्रामीणों को उन पुराने संयंत्रों की याद सताने लगी है।वन विभाग के सामने ‘दोहरी चुनौती’रसोई ईंधन के इस संकट ने वन विभाग की मुश्किलें भी बढ़ा दी हैं। ग्रामीणों की जंगल में बढ़ती आवाजाही विभाग के लिए दोहरी चुनौती बन गई है। एक ओर विभाग को जंगलों के संरक्षण के लिए ग्रामीणों को लकड़ी काटने से रोकना पड़ रहा है, वहीं दूसरी ओर आबादी से सटे जंगलों में सूखी लकड़ी बीनने गए ग्रामीणों को बाघ, गुलदार और भालू जैसे हिंसक जानवरों के हमलों से बचाना भी एक बड़ी चुनौती है। वन अधिकारियों के मुताबिक, संवेदनशील इलाकों में गश्त बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं, ताकि मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं पर अंकुश लगाया जा सके।जंगल घास व जलौनी लकड़ी बीनने के लिए जाने वालों की ग्रामीणों को संख्या बढ़ गई है। ग्रामीणों को लगातार जंगल के संवेदनशील इलाकों में नहीं जाने के लिए कहा जा रहा है। वहीं संवेदनशील इलाकों में गस्त बढ़ा दी गई है ताकि किसी भी तरह की अप्रिय घटना को रोका जा सके।ध्रुव सिंह मर्तोलिया, डीएफओ, रामनगर

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