उत्तराखंड में धीमी पड़ रही होली की ढोलक: हल्द्वानी की ‘ढोलक बस्ती’ के कारीगरों पर डीजे का असर, संकट में पीढ़ियों पुराना कारोबार – Nainital News

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होली का त्योहार आते ही पहाड़ से लेकर मैदान तक फाग के गीतों की गूंज सुनाई देती थी। ढोलक और मंजीरे की थाप पर लोग रात-रात भर बैठकर होली गाते थे और गांव-कस्बों में उत्सव का माहौल बन जाता था। रंगों के इस पर्व में ढोलक सिर्फ एक वाद्य यंत्र नहीं बल्कि होली

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उत्तराखंड में भी होली की परंपरा ढोलक की थाप से ही जीवंत होती रही है। कुमाऊं के कई इलाकों में तो फाग गायन की शुरुआत ही ढोलक से होती है। लेकिन समय के साथ इस परंपरा की आवाज धीमी पड़ने लगी है।

कुमाऊं की आर्थिक राजधानी कहे जाने वाले हल्द्वानी में एक बस्ती ऐसी भी है जिसकी पहचान ही ढोलक से बनी। रेलवे स्टेशन के पास स्थित इस इलाके को लोग “ढोलक बस्ती” के नाम से जानते हैं। यहां दशकों से हजारों परिवार ढोलक बनाने और बेचने के काम से जुड़े रहे हैं। कभी यहां तैयार होने वाली ढोलक देश के अलग-अलग राज्यों तक जाती थी, लेकिन अब बदलते समय के साथ यह परंपरा संकट में दिखाई देने लगी है।

ढोलक बस्ती में सड़क किनारे बैठ ढोलक बेचते कारिगर।

ढोलक बस्ती में सड़क किनारे बैठ ढोलक बेचते कारिगर।

कभी पूरे देश में जाती थीं हल्द्वानी की ढोलक

हल्द्वानी की ढोलक बस्ती लंबे समय तक पारंपरिक वाद्य यंत्र बनाने का बड़ा केंद्र रही है। यहां के कारीगरों की बनाई ढोलक उत्तराखंड ही नहीं बल्कि देश के कई राज्यों में भेजी जाती थीं।

कारीगर बताते हैं कि एक समय ऐसा था जब कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक हल्द्वानी की ढोलक की मांग रहती थी। राजस्थान, बिहार, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों में भी यहां की ढोलक पहुंचती थी। होली का मौसम आते ही यहां के कारीगर अपनी ढोलक लेकर अलग-अलग शहरों और गांवों में निकल जाते थे और वहीं से उनका साल भर का खर्च निकल आता था।

इस कारोबार ने कई पीढ़ियों को रोजगार दिया। ढोलक बनाना सिर्फ एक काम नहीं बल्कि कई परिवारों की पहचान और विरासत बन गया था।

2 हजार परिवारों की रोजी-रोटी का सहारा

ढोलक बस्ती में रहने वाले लोगों के अनुसार यहां करीब दो हजार परिवार पिछले कई दशकों से ढोलक बनाने के काम से जुड़े रहे हैं। परिवार के बड़े-बुजुर्गों से यह कला नई पीढ़ी तक पहुंचती रही।

लकड़ी को आकार देना, चमड़ा चढ़ाना, रस्सी या नाल से उसे कसना, ढोलक बनाने की यह पूरी प्रक्रिया मेहनत और कौशल मांगती है। एक अच्छी ढोलक तैयार करने में समय भी लगता है और लागत भी आती है।

कारीगर बताते हैं कि पहले होली, शादी-समारोह या तीज-त्योहार के कार्यक्रमों में ढोलक की मांग बहुत रहती थी। ऐसे में साल का बड़ा हिस्सा इन्हीं आयोजनों के सहारे गुजर जाता था। लेकिन अब धीरे-धीरे हालात बदल रहे हैं।

ढोलक के पेंच कसता कारिगर।

ढोलक के पेंच कसता कारिगर।

डीजे और डिजिटल दौर ने बदली तस्वीर

ढोलक बनाने वाले कारीगरों का कहना है कि आधुनिक दौर में डीजे और डिजिटल संगीत ने पारंपरिक वाद्य यंत्रों की जगह ले ली है।

पहले होली के कार्यक्रमों में लोग ढोलक और मंजीरे की धुन पर फाग गीत गाते थे। गांवों में माघ महीने से ही होली के गीतों की शुरुआत हो जाती थी और देर रात तक बैठकी होली या खड़ी होली का आयोजन चलता था।

अब अधिकतर जगहों पर डीजे और लाउडस्पीकर का इस्तेमाल होने लगा है। इससे ढोलक की मांग कम होती जा रही है। कारीगरों का कहना है कि पहले जहां हर आयोजन में ढोलक बजती थी, वहीं अब यह परंपरा धीरे-धीरे खत्म होती नजर आ रही है।

होली का सीजन भी अब पहले जैसा नहीं

ढोलक बस्ती के एक व्यापारी बताते हैं कि होली का मौसम पहले उनके लिए सबसे बड़ा कारोबार का समय होता था। वे ढोलक लेकर पूरे उत्तराखंड के अलग-अलग इलाकों में जाते थे।

उनके अनुसार पहले धारचूला और तवाघाट से लेकर गढ़वाल क्षेत्र के केदारनाथ और बद्रीनाथ तक उन्होंने ढोलक बेचने के लिए यात्राएं कीं। उस समय काम अच्छा चलता था और पूरे साल की कमाई इसी सीजन से निकल जाती थी।

लेकिन पिछले कुछ वर्षों से कारोबार में लगातार गिरावट आ रही है। व्यापारी कहते हैं कि काम अब बहुत कम हो गया है और यह समझ पाना भी मुश्किल है कि आखिर इसकी असली वजह क्या है।

80 साल पुरानी परंपरा पर संकट

ढोलक बस्ती के एक अन्य कारीगर बताते हैं कि यह काम उनके परिवार में करीब 80 साल से चल रहा है। वे ढोलक बनाकर गांव-गांव और पहाड़ी इलाकों में सप्लाई करते रहे हैं।

होली का मौसम उनके लिए खास होता है, क्योंकि इसी समय ढोलक की मांग सबसे ज्यादा रहती है। लेकिन अब यह सीजन भी पहले जैसा नहीं रहा।

उनका कहना है कि समय बदलने के साथ कारोबार पर असर पड़ा है और अब हर किसी को इस बदलाव का सामना करना पड़ रहा है।

कारिगर बताते हैं कि पहले तो होली के सीजन में अच्छी कमाई होती थी लेकिन अब ढोलक की बिक्री काफी कम हो गई है।

कारिगर बताते हैं कि पहले तो होली के सीजन में अच्छी कमाई होती थी लेकिन अब ढोलक की बिक्री काफी कम हो गई है।

500 से 5000 रुपए तक की ढोलक

कारीगरों के अनुसार एक ढोलक की कीमत उसकी गुणवत्ता और आकार के अनुसार तय होती है। आम तौर पर एक ढोलक 500 रुपये से लेकर 5000 रुपये तक बिकती है।

पहले रस्सी से कसी जाने वाली ढोलक की मांग ज्यादा रहती थी। लेकिन अब नट-बोल्ट और नाल वाली ढोलक ज्यादा पसंद की जा रही है।

इसके बावजूद कारीगरों का कहना है कि ढोलक बनाने में लागत बढ़ती जा रही है, जबकि ग्राहक उतनी कीमत देने को तैयार नहीं होता। इससे इस पेशे से जुड़े लोगों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा होने लगा है।

बदलते समय में खोती जा रही थाप

हल्द्वानी की ढोलक बस्ती कभी होली के मौसम में बेहद रौनक भरी होती थी। कारीगर दिन-रात ढोलक तैयार करते और व्यापारी उन्हें लेकर अलग-अलग जगहों पर बेचने निकल जाते थे।

लेकिन अब यह रौनक पहले जैसी नहीं रही। डिजिटल संगीत और डीजे के दौर में पारंपरिक वाद्य यंत्रों की जगह कम होती जा रही है।

इसके बावजूद ढोलक बस्ती के कारीगर अपनी इस विरासत को बचाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। उनके लिए ढोलक सिर्फ कारोबार नहीं बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही एक परंपरा है—जिसकी थाप आज भी होली की यादों में गूंजती है, भले ही उसकी आवाज पहले से धीमी क्यों न हो गई हो।

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