जहां से कई सिर काटकर ले गया था जर्मनी… ऐसी है नामीबिया की एक देश बनने की दर्दनाक कहानी!

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नामीबिया एक अफ्रीकी देश है. आज टी-20 वर्ल्डकप में इस देश के शामिल होने को लेकर काफी चर्चा हो रही है. वैसे भी खेल जगत में क्रिकेट को लेकर नामीबिया एक जाना पहचाना नाम है. लेकिन, कुछ दशक पहले तक ऐसा नहीं था. इस देश के हालात काफी अलग थे. यहां के लोगों ने कई नरसंहारों और अमानवीय यातनाओं को झेला. एक के बाद दूसरे साम्राज्यवादी देश ने यहां चाबुक चलाए. फिर भी 1990 एक अलग अस्तित्व और नए नाम के साथ नामीबिया ने राष्ट्र के तौर पर अपनी पहचान बनाई.

नामीबिया में 100 पहले जर्मनी ने कई बड़े नरसंहार किए थे. इस दौरान लाखों लोग मारे गए थे. इनमें से सैकड़ों लोगों के सिर काटकर जर्मन अधिकारी अपने देश ले गए थे. कुछ साल पहले जर्मनी ने उनका उपनिवेश रहे  नामीबिया में हुए नरसंहार के दौरान मारे गए वहां के लोगों की खोपड़ियां लौटाई थीं. 

इन खोपड़ियों और हड्डियों को गोरे यूरोपीय लोगों की नस्लीय श्रेष्ठता को साबित करने के लिए किए जाने वाले शोध के लिए जर्मनी भेजा गया था, जिसे कुछ साल पहले अमान्य घोषित कर दिया गया और उन्हें वापस लौटा दिया गया. यह घटना नामीबिया के उस दर्दनाक इतिहास की एक झलक दिखाती है, जिस अत्याचार और अमानवीय प्रताड़ना को वो सदियों से झेलते आ रहे थे.  

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नामीबिया को पहले दक्षिण पश्चिम अफ्रीका कहा जाता था. 20वीं शताब्दी के शुरुआती वर्षों में यहां आए यूरोपीय लोगों के हाथों दशकों तक लूटपाट और औपनिवेशिक हिंसा को झेलता रहा. नामीबिया 1884 से 1915 तक जर्मन कब्जे में था. इस दौरान 1904 में नामीबिया के लोगों का जनसंहार शुरू हुआ.  जर्मन उपनिवेशवादियों ने नामीबिया के हजारों लोगों को मार डाला, जिसे दुनिया का “भुला दिया गया नरसंहार” कहा जाता है.

जर्मन अधिकारियों ने काले अफ्रीकियों को गिनी पिग की तरह इस्तेमाल किया. उन भयानक अपराधों के तहत न सिर्फ बड़े पैमाने पर नामीबिया के लोगों को मारा गया, बल्कि उनके अवशेष के साथ भी रिसर्च के नाम पर अमानवीय व्यवहार किए गए. ऐसा ही कुछ बाद में नाजियों ने होलोकॉस्ट के दौरान दोहराया. 

नरसंहार का आदेश क्यों जारी किया गया?
जर्मनों द्वारा उनकी भूमि और मवेशियों पर कब्जा करने के विरोध में हेरेरो और नामा लोगों के विद्रोह के बाद 1904 में नरसंहार शुरू हुआ. जर्मनी के लोगों ने जवाब में हजारों हेरेरो और नामा लोगों की हत्या कर दी. उस समय जर्मन दक्षिण पश्चिम अफ्रीका के नाम से जाने जाने वाले क्षेत्र में सैन्य प्रशासन के प्रमुख, लोथर वॉन ट्रोथा ने अक्टूबर 1904 में एक नरसंहार आदेश जारी किया

हेरेरो और नामा जनजातियों को रेगिस्तान में धकेल दिया गया और जो भी अपनी भूमि पर लौटने की कोशिश करते पाए गए, उन्हें या तो मार दिया गया या नजरबंदी शिविरों में डाल दिया गया. मरने वालों की सही संख्या पर कोई सहमति नहीं है, लेकिन कुछ अनुमानों के अनुसार यह संख्या 100,000 तक हो सकती है.

अब भी जर्मनी में है नामीबिया के लोगों की खोपड़ियां
कुछ पीड़ितों की खोपड़ियों को जर्मनी भेजा गया, जहां नस्लीय मानवविज्ञानी ने यूरोपीय लोगों की श्रेष्ठता के सिद्धांत को सही ठहराने के प्रयास के तहत उनका अध्ययन किया. ऐसा माना जाता है कि जर्मनी में सैकड़ों नामीबियाई खोपड़ियां हैं और बुधवार को 25 से अधिक अवशेष वापस सौंप दिए गए.

जब प्रथम विश्व युद्ध में जर्मनी ने अपना उपनिवेश खो दिया. इसके बाद नामीबिया श्वेत दक्षिण अफ्रीका के शासन के अधीन आ गया, जिसने अपने नस्लवादी कानूनों को देश में लागू किया, जिससे काले नामीबियाई लोगों को किसी भी राजनीतिक अधिकार से वंचित कर दिया गया, साथ ही सामाजिक और आर्थिक स्वतंत्रता को भी प्रतिबंधित कर दिया गया. 

इसके बाद दक्षिण अफ्रीका के हाथों नामीबिया के लोगों का भाग्य लिखा जाने लगा. अल्पसंख्यक गोरे समुदाय जिन्होंने दक्षिण अफ्रीका समेत कई अफ्रीकी देशों पर कब्जा कर रखा था. नस्लीय भेदभाव और  अन्य अत्याचारी कानून के तहत श्वेत लोगों ने नामीबिया के लोगों को प्रताड़ित करना शुरू कर दिया. अमानवीय व्यवहारों और कानूनों से तंग आकर लोगों ने विद्रोह शुरू कर दिया. एक साथ अलग-अलग अफ्रीकी राज्यों में विरोध शुरू हो गए.  इन व्यापक रंगभेद कानूनों की शुरुआत के कारण 1966 में स्वतंत्रता के लिए नामीबिया में एक गुरिल्ला युद्ध छिड़ गया. अंतत: 1990 नामीबिया को आजदी मिल गई.

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