पंजाब राज्यपाल के नशा मुक्ति अभियान में सियासत का ‘कॉकटेल‘

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‘युद्ध नशियां विरुद्ध’ – पंजाब में पिछले साल शुरू किए गए इस कैंपेन को लेकर नए सिरे से राजनीति शुरू हो गई है. असल में पंजाब के राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया ने भी इसी नाम से नशे के खिलाफ मुहिम को आगे बढ़ाया है – लेकिन, सत्ताधारी आम आदमी पार्टी ने ही राज्यपाल के अभियान से दूरी बना ली है. 

पंजाब के राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया ने तरनतारन से अबोहर तक नशा मुक्त यात्रा शुरू की थी. 9 फरवरी को जैसे ही यह यात्रा फिरोजपुर पहुंची विवादों का शिकार हो गई. फिरोजपुर में बीजेपी और शिरोमणि अकाली दल के नेता शामिल हुए, लेकिन आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के नेताओं ने दूरी बना ली. 

नशा मुक्ति यात्रा के दौरान फाजिल्का में राज्यपाल कटारिया ने दुख जताते हुए बताया था कि अभियान में शामिल होने के लिए छोटे-बड़े सभी नेताओं को बुलाया गया था, लेकिन वे शामिल नहीं हुए. अबोहर में राज्यपाल ने कहा कि पंजाब सरकार राज्य को नशा मुक्त बनाने के लिए लगातार प्रयास कर रही है. पंजाब पुलिस की सक्रियता से अन्य राज्यों और सरहद पार से भारी मात्रा में आने वाले नशीले पदार्थ जब्त किए जा रहे हैं. अब तक हजारों नशा तस्करों के खिलाफ मामले दर्ज कर सलाखों के पीछे भेजा जा चुका है – क्या राज्यपाल उस मुहिम का जिक्र नहीं कर रहे थे, जिसे पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल के साथ शुरू किया था. और, महीना भर पहले ही अभियान का दूसरा चरण शुरू हुआ है. 

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नशे के खिलाफ मुहिम में दलगत राजनीति की एंट्री

ड्रग्स के खिलाफ पंजाब की आम आदमी पार्टी की सरकार के ‘युद्ध नशियां विरुद्ध’ कैंपेन की राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया कई बार सरेआम तारीफ कर चुके हैं. गणतंत्र दिवस के संबोधन में भी राज्यपाल ने पंजाब सरकार के अभियान की प्रशंसा की थी, लेकिन जब वो खुद नशे के खिलाफ यात्रा पर निकले तो राजनीति शुरू हो गई. 

नशा मुक्ति यात्रा के फिरोजपुर पहुंचते ही बीजेपी और शिरोमणि अकाली दल नेता भी उनके साथ शामिल हो गए थे. पंजाब बीजेपी के कार्यकारी अध्यक्ष अश्विनी शर्मा और बीजेपी नेता राणा गुरमीत सिंह सोढी कटारिया के साथ मार्च में शामिल थे, जबकि बाद में शिरोमणि अकाली दल के प्रमुख सुखबीर बादल फिरोजपुर स्कूल ऑफ एमिनेंस पहुंचकर शामिल हो गए. 

फिरोजपुर में राज्यपाल लोगों को संबोधित कर रहे थे. सुखबीर बादल के पहुंचने पर राज्यपाल ने भाषण रोक दिया, और मंच से उनका स्वागत किया. फिर क्या था, राजनीति शुरू हो गई. अपने संसदीय क्षेत्र में राज्यपाल का कार्यक्रम होने के बावजूद कांग्रेस सांसद शेर सिंह घुबाया दूर ही रहे. फिरोजपुर के आम आदमी पार्टी के चारों विधायक भी यात्रा में शामिल नहीं हुए. फाजिल्का में भी ठीक ऐसा ही विरोध देखने को मिला. फाजिल्का के आम आदमी पार्टी के तीन विधायकों ने यात्रा से भी यात्रा से दूरी बना ली थी. 

फाजिल्का में राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया ने नशा विरोधी जागरूकता अभियान के तहत लालबत्ती चौक से घंटाघर तक खुद सड़क पर पैदल मार्च का नेतृत्व किया. राज्यपाल के साथ जिला प्रशासन के बड़े अधिकारी, छात्रा और शहर के गणमान्य नागरिक बड़ी संख्या में शामिल हुए. बीजेपी नेता गुरमीत सिंह सोढ़ी और पार्टी के कई नेता शामिल हुए, लेकिन सत्ताधारी आम आदमी पार्टी का कोई नेता नजर नहीं आया. 

लोगों को राज्यपाल के संबोधन में भी ये पीड़ा साफ तौर पर दिखी, मैंने व्यक्तिगत रूप से सभी पार्टियों के वर्तमान और पूर्व विधायकों, सांसदों, राज्यसभा सदस्यों को फोन करके बुलाया था… मैंने धर्मगुरुओं से भी सम्पर्क किया… मेरी कोशिश थी कि सब मिलकर नशे के खिलाफ आवाज बुलंद करें.

पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग ने राज्यपाल की यात्रा पर तीखा हमला बोला है. शिरोमणि अकाली दल और बीजेपी नेताओं की मौजूदगी पर सवाल उठाते हुए राजा वड़िंग ने पूछा है, क्या नशे के खिलाफ यह मार्च वास्तव में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले ‘समझौता एक्सप्रेस’ चलाने और नए SAD-बीजेपी गठबंधन की जमीन तैयार करने की कोशिश है, जो 2020-21 के किसान के आंदोलन के दौरान टूट गया था?

कांग्रेस नेता का कहना है कि कि राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया और सुखबीर सिंह बादल के साथ की तस्वीरें साफ तौर पर राजनीतिक संदेश देती हैं, जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता. कांग्रेस नेता का एक और सवाल था कि क्या राज्यपाल ने सीमा पार से नशे की तस्करी जैसे मुद्दों को गृह मंत्रालय के सामने उठाया है?

आम आदमी पार्टी के प्रवक्ता कुलदीप सिंह धालीवाल का कहना है कि यह पहल महज प्रतीकात्मक या राजनीतिक स्तर पर नहीं होनी चाहिए, बल्कि नशे के खिलाफ लड़ाई ईमानदार और जनता-केंद्रित होनी चाहिए. कुलदीप सिंह धालीवाल ने कहा कि राज्यपाल कटारिया की यात्रा में शामिल नेता उन्हीं राजनीतिक दलों के हैं, जिनकी सरकार में नशे की समस्या पंजाब में फैल गई. AAP नेता का कहना है कि ऐसे नेताओं के साथ खड़े होने से जनता को गलत संदेश जाता है और नशा विरोधी आंदोलन की गंभीरता को कमजोर करता है.

सामाजिक कार्यों में शामिल होने की परंपरा

पहले भी राज्यपाल कई तरह की सामाजिक गतिविधियों में शामिल होते रहे हैं, लेकिन राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया की मुहिम काफी अलग है. नशे के खिलाफ अभियान पंजाब में पहले से चल रहा है. नशा मुक्ति अभियान का क्रेडिट मुख्यमंत्री भगवंत मान और उनके नेता अरविंद केजरीवाल लेते रहे हैं, लेकिन उसी नाम से उसी मुहिम को आगे बढ़ाना आम आदमी पार्टी के नेताओं को बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा है. 

कर्नाटक में दो साल पहले राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने भी नशे के खिलाफ ‘युवा शुद्धि अभियान की शुरुआत की थी, जिसमें कॉलेजों और युवाओं के बीच नशे के खिलाफ जागरूक करने पर जोर दिया गया था. कर्नाटक की मुहिम पंजाब की तरह मार्च या पदयात्रा के रूप में नहीं थी, बल्कि कैंपेन की तरह आयोजित की गई थी. 

अलग अलग समय पर देश के कई राज्यों में राज्यपालों की तरफ से सामाजिक मुहिम की पहल देखी गई है. मसलन, उत्तराखंड के राज्यपाल रहते बेबी रानी मौर्य ने महिला सुरक्षा और सशक्तिकरण के मुद्दों पर पूरे राज्य में संवाद कार्यक्रम चलाया था. और वैसे ही अनुसूइया उइके ने आदिवासी अधिकार, असम में जगदीश मुखी ने कैंपस आउटरीच कार्यक्रम, नगालैंड के राज्यपाल रहते हुए आरएन रवि ने राज्य-एकीकरण और शांति संदेश के अभियान रूप में पेश किया. 

राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया के पंजाब में नशा मुक्ति मुहिम के नेतृत्व करने के दो पहलू हैं. जो अभियान सत्ताधारी पार्टी की मुहिम तक सीमित था, राज्यपाल ने उसमें विपक्ष के नेताओं को भी शामिल करने का प्रयास किया. विपक्ष के नेता तो शामिल हुए, लेकिन सत्ता पक्ष नाराज हो गया, और यात्रा का बहिष्कार कर दिया. सत्ता पक्ष की आशंका अपनी जगह है. अपना शुरू किया अभियान भला वे लोग शेयर करें तो क्यों और कैसे? जब सभी राजनीतिक दल के नेता शामिल हो जाएंगे, तो चुनावों में सत्ताधारी पार्टी अकेले दावा कैसे कर सकेगी?

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