प्रेम हो तो पार्वती जैसा… नारद मुनि ने भड़काया, सप्तर्षियों ने रोका फिर भी शिवजी को पाकर ही मानीं शिवानी

Date:

अजब ही सुंदर संयोग है. फरवरी का महीना है. मौसम में ताजगी है, नयापन है, उत्साह है. दिल में उमंग है और तरंगें उठ रही हैं. यूरोपियन कल्चर ने इस सुंदर मौसम को सेलिब्रेट करने के लिए हमें वैलेंटाइन का एक पूरा हफ्ता दिया है. वैलेंटाइन… यानी प्रेम को स्वीकारने, जताने, पाने और इसे महसूस करने का दिन. कहते हैं कि एक संत ने सम्राट से बगावत की. सम्राट ने प्रेम पर ही रोक लगा दी थी. विवाह पर बंदिशें कर दी थीं. संत को ये बात जंची नहीं. लिहाजा निकल पड़े प्रेम की स्याही से बगावत लिखने.

ये तो हुई वैलेंटाइन की बात… लेकिन असल सवाल ये है कि प्रेम आपको कितना समझ में आता है. या आज की पीढ़ी इसे किस तरह से देखती है? इस सवाल का जवाब वक्त देता है और बड़े मौके से देता है. क्योंकि मौका है महाशिवरात्रि का. महाशिवरात्रि पूजा, आस्था, भक्ति, विश्वास का तो दिन है ही. साथ ही यह प्रेम के लिए भी बहुत बड़ा दिन है. वह दिन जब दो शास्वत प्रेमी एकाकार हो गए थे. जिन्हें हम महादेव शिव और पार्वती मां के तौर पर देखते हैं. उनकी प्रेम कथा से सुंदर कोई कहानी हैं. 

ये कहानी इसलिए भी बड़ी हो जाती है क्योंकि इसमें प्रेम पाने के लिए जो तप किया गया, जो एफर्ट्स किए गए, जो संघर्ष किया गया वह सिर्फ एक जन्म तक सिमटा हुआ नहीं है. बल्कि जन्म-जन्मांतर तक का प्रयास है.  

सम्बंधित ख़बरें

महाशिवरात्रिः महादेव और माता पार्वती के मिलन का दिन
महाशिवरात्रि को महादेव और देवी पार्वती की मैरिज एनीवर्सरी के तौर पर देखा जाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि शिवजी को पाने के लिए शिवानी ने कितनी कठिन साधना की थी. 

जब वैलेंटाइन डे प्रेम के इज़हार का उत्सव बन जाता है तो इसी समय इसका सामना महाशिवरात्रि से होता है. एक ओर आधुनिक प्रेम का दिन, दूसरी ओर सनातन परंपरा का तप और समर्पण का पर्व. अगर इन दोनों को एक साथ रखकर देखें तो एक सवाल उठता है—क्या प्रेम केवल आकर्षण है या वह तप, त्याग और अटूट विश्वास का नाम भी है? इस सवाल का सबसे सुंदर उत्तर देवी पार्वती की कथा देती है.

यह प्रेम कहानी किसी राजकुमार और राजकुमारी की नहीं, बल्कि सृष्टि के संतुलन की कथा है. जब राजा दक्ष के यज्ञ में अपमानित होकर सती ने देह त्याग दी, तब शिव विरक्त होकर समाधि में लीन हो गए. संसार असंतुलित हो गया. देवताओं पर तारकासुर का अत्याचार बढ़ा. वरदान था कि उसका वध केवल शिव-पुत्र ही कर सकता है.

Mahashivratri

इधर सती जो खुद में पराशक्ति थी, वह जो चाहती थी वह कर सकती थीं, लेकिन उन्होंने भी खुद को कर्मफल के अधीन रखा. शिवजी को फिर से अपने पति के रूप में पाने के लिए सती ने हिमालय के घर पार्वती के रूप में जन्म लिया. यह प्रसंग शिव पुराण की रुद्र संहिता में विस्तार से आता है. स्कंद पुराण भी इसका जिक्र करता है और संत तुलसीदास ने रामचरित मानस में इसका बखूबी वर्णन किया है.

अब देखिए कि हिमालय के घर में एक पुत्री का जन्म हुआ है. वह पुत्री आदिशक्ति ही है. एक दिन देवर्षि नारद हिमालय से मिलने आए. तब राजा-रानी ने अपनी पुत्री पार्वती के भविष्य के बारे में उनसा पूछा. देवर्षि नारद ने पहले तो पार्वती के सभी शुभ लक्षणों का जिक्र किया. फिर अचानक कह उठे कि इसके जीवन में एक ही दोष है कि इसका विवाह किसी गुणहीन, धनहीन, विरक्त, बिना मान वाला और माता-पिता विहीन लापरवाह व्यक्ति से ही होगा.

रामचरित मानस में इसका जिक्र देखिए…
सैल सुलच्छन सुता तुम्हारी। सुनहु जे अब अवगुन दुइ चारी॥
अगुन अमान मातु पितु हीना। उदासीन सब संसय छीना॥4॥

भाव:-हे पर्वतराज! तुम्हारी कन्या सुलच्छनी है। अब इसमें जो दो-चार अवगुण हैं, उन्हें भी सुन लो। गुणहीन, मानहीन, माता-पिताविहीन, उदासीन, संशयहीन (लापरवाह)॥4॥

जोगी जटिल अकाम मन नगन अमंगल बेष।
अस स्वामी एहि कहँ मिलिहि परी हस्त असि रेख॥67॥

भाव:- योगी, जटाधारी, निष्काम हृदय, नंगा और अमंगल वेष वाला, ऐसा पति इसको मिलेगा. इसके हाथ में ऐसी ही रेखा पड़ी है॥67॥

ये सुनकर हिमालय की पत्नी और पार्वती की मां बहुत घबराईं. तब देवर्षि नारद ने कहा कि अगर इसका विवाह शिवजी से हो तो ये सब अवगुण भी शुभ लक्षणों में बदल जाएंगे. वरना इस बला का कोई उपाय नहीं है. एक तरफ हिमालय ने इसे कर्म का फल कहा, रानी मैना घबरा गईं और उधर पार्वती के मन में संकल्प ने जन्म लिया. उन्होंने ठान लिया कि उन्हें क्या करना है.

बचपन से ही पार्वती के मन में एक ही संकल्प था, महादेव शिव को पति रूप में पाना. यह कोई क्षणिक आकर्षण नहीं, जन्म-जन्मांतर का नाता था. तब नारद मुनि ने जो इस तरह उन्हें और उनके पिता को भड़काया तो यही उनका भड़काना प्रेरणा बन गया. प्रेम की ओर पहला कदम बन गया. कथा कहती है कि देवर्षि नारद ने पार्वती को उनके पूर्वजन्म का स्मरण कराया और बताया कि शिव ही उनके नियत पति हैं. साथ ही यह भी कहा कि शिव को पाना आसान नहीं, इसके लिए कठोर तप करना होगा.

आज की भाषा में कहें तो नारद ने ‘भड़काया’, लेकिन यह भड़काना उकसावा नहीं, जागरण था. उन्होंने पार्वती को उनकी आत्मशक्ति का बोध कराया. स्कंद पुराण में वर्णन है कि देवी पार्वती ने हिमालय की कंदराओं में घोर तपस्या शुरू की. पहले फलाहार, फिर केवल पत्तों पर जीवन, और अंत में पत्तों का भी त्याग. इसी कारण उनका नाम पड़ा अपर्णा.

देवी पार्वती का प्रेम तप की अग्नि में और निखरता गया.

लेकिन अभी कई परीक्षाएं बाकी थीं. जब देवी पार्वती का तप असाधारण हो गया, तब शिव ने उनकी निष्ठा को परखने के लिए सप्तर्षियों को भेजा. उन्होंने पार्वती को समझाया ‘तुम पर्वतराज की कन्या हो. शिव तो औघड़ हैं, श्मशानवासी हैं, सर्प धारण करते हैं. क्या तुम ऐसा जीवन चाहती हो?’ यह प्रसंग भी शिव पुराण में मिलता है. यह वही क्षण था, जब कोई भी मन डगमगा सकता था. परिवार, समाज और तर्क सब एक ओर थे लेकिन माता पार्वती का संकल्प दूसरी ओर. उन्होंने सप्तर्षियों से बड़े आदर सहित कहा कि उन्होंने शिवजी को अपना पति मान लिया है, तो अब मैं उनके गुण-दोष नहीं देखती. 

यह प्रेम केवल भावना नहीं, निर्णय था. ऐसा निर्णय, जो परिस्थितियों से नहीं बदलता. तब शिव आखिर में एक ब्राह्मण बनकर एक बार और आए. वह खुद शिव की निंदा करने लगे, कहने लगे शिव तो निर्धन हैं, भस्म रमाते हैं, नाग पहनते हैं. तुम उनसे विवाह क्यों करना चाहती हो?’ यह प्रसंग महाकवि कालिदास के कुमारसंभव में भी आया है और रामचरित मानस में संत तुलसी ने तो बहुत सुंदर वर्णन किया है. 

लेकिन पार्वती ने उस ब्राह्मण को भी प्रणाम कहकर जाने के लिए कहा और अपने निश्चय पर अडिग रहीं. तभी शिव अपने वास्तविक रूप में प्रकट हुए और पार्वती के तप और प्रेम को स्वीकार किया. हिमालय पर उनका दिव्य विवाह हुआ और इस दो शाश्वत प्रेमी एक हो गए. 

आज वैलेंटाइन डे पर प्रेम का इज़हार अक्सर उपहारों और शब्दों में सिमट जाता है. लेकिन पार्वती की कथा सिखाती है कि प्रेम केवल पाने का नाम नहीं, बल्कि खुद को तपाकर योग्य बनाने का नाम है. देवी पार्वती ने शिव को बदलने की कोशिश नहीं की. उन्होंने खुद को तप से ऐसा बनाया कि शिव को उन्हें स्वीकार करना पड़ा. यह प्रेम स्वामित्व का नहीं, समर्पण का था.
शिव विरक्ति के प्रतीक हैं, पार्वती शक्ति की. दोनों का मिलन ही संसार का संतुलन है. इसलिए महाशिवरात्रि केवल शिव की पूजा नहीं, शिव-पार्वती के मिलन का भी उत्सव है.

महाशिवरात्रि: प्रेम का आध्यात्मिक पर्व

महाशिवरात्रि की रात जब भक्त शिवलिंग पर जल चढ़ाते हैं, तो वह केवल अनुष्ठान नहीं होता. वह शिव और शक्ति के मिलन की स्मृति है. यह याद दिलाता है कि तप और प्रेम साथ-साथ चल सकते हैं. देवी पार्वती का प्रेम हमें सिखाता है कि सच्चा संबंध समय, दूरी और परीक्षाओं से परे होता है. वह दिखावे से नहीं, धैर्य और विश्वास से फलता है. आज की तेज रफ्तार जिंदगी में रिश्ते जल्दी बनते हैं और जल्दी टूट भी जाते हैं. ऐसे में मां पार्वती और महादेव की कथा स्थिरता का संदेश देती है.

उन्होंने समाज की बात सुनी, तर्कों को समझा, लेकिन अपने हृदय की आवाज नहीं छोड़ी. उन्होंने अपने प्रेम को सिद्ध करने के लिए तप किया, दूसरे को बदलने के लिए नहीं, खुद को निखारने के लिए. वैलेंटाइन डे हमें प्रेम का इज़हार सिखाता है. महाशिवरात्रि हमें प्रेम का अर्थ समझाती है. अगर प्रेम में धैर्य हो, तप हो, समर्पण हो और विश्वास हो तो वह पार्वती जैसा हो सकता है. ऐसा प्रेम, जो सिर्फ दो आत्माओं का मिलन नहीं बनता, बल्कि ब्रह्मांड को संतुलित कर देता है.

—- समाप्त —-

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Share post:

Subscribe

spot_imgspot_img

Popular

More like this
Related

‘SNL’ Goes All In: Trump’s Wild Calls To Tiger, Melania & Hegseth Spark Frenzy

Asha Bhosle Passes Away At 92: President Murmu, PM...