डबल डेकर बस या ताबूत? पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे पर हुए हादसे ने खोली ‘मौत की बसों’ की पोल

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पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे पर तेज रफ्तार डबल डेकर बस के पलटने से पांच यात्रियों की मौत और 66 लोगों के घायल होने की घटना ने लंबी दूरी की निजी बसों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. पंजाब के लुधियाना से बिहार के दरभंगा जा रही हरियाणा नंबर की यह बस बाराबंकी-लखनऊ सीमा के पास अनियंत्रित होकर पलट गई. हादसा इतना भीषण था कि बस के शीशे और पुर्जे करीब 100 मीटर तक बिखर गए, कई यात्री खिड़कियों से बाहर जा गिरे और स्लीपर सीटों से शव लटके मिले.

मृतकों में तीन बच्चे और दो पुरुष शामिल हैं. घायलों को आसपास के अस्पतालों में भर्ती कराया गया है. प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, बस की रफ्तार करीब 100 किमी प्रति घंटा थी और वह सांप की तरह लहरा रही थी. एक चश्मदीद ने आजतक को बताया कि बस पहले भी दो बार झटके खाकर संभली, लेकिन तीसरी बार नियंत्रण पूरी तरह खो बैठी. हादसे के बाद यात्रियों ने जूतों से शीशे तोड़कर बाहर निकलने की कोशिश की.

जिस वक्त बस पलटी, जोर का धमाका हुआ, लोग जूतों से खिड़कियों के शीशे तोड़ने लगे. लेकिन सवाल ये है कि ये डबल डेकर बस मौत का ताबूत क्यों बन गई? इसके पीछे जांच में चौंकाने वाली वजह सामने आई है. दरअसल, हादसे के बाद जब बस को क्रेन से सीधा कर अंदर की जांच की गई तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए. जांच टीम के साथ आजतक की टीम भी इस डबल डेकर बस के अंदर पहुंची. बस के अंदर साफ-साफ दिखाई देता है कि नियमों की धज्जियां उड़ाई गई हैं. हरियाणा नंबर की सुप्रिया ट्रैवल्स के नाम से चल रही इस बस में डबल डेकर के जो मानक होते हैं, उनको ताक पर रख दिया गया. 

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आरटीओ अधिकारियों की प्रारंभिक पड़ताल में पाया गया कि बस के मूल डिजाइन से छेड़छाड़ की गई थी. रिकॉर्ड के अनुसार बस में 16 स्लीपर और 32 सिटिंग सीटों की अनुमति थी, लेकिन अंदर 43 स्लीपर सीटें बनाई गई थीं और सिटिंग सीटें घटाकर केवल नौ रह गई थीं. यानी क्षमता बढ़ाने के लिए संरचनात्मक बदलाव किए गए. बस की छत पर भी अतिरिक्त लोहे के स्ट्रक्चर लगाए गए थे और लंबाई-चौड़ाई से भी छेड़छाड़ की गई थी. सबसे गंभीर बात यह सामने आई कि इमरजेंसी गेट के सामने भी सीट लगा दी गई थी, जिससे आपातकालीन निकास अवरुद्ध हो गया था. 

बस की छत पर अतिरिक्त लोहे का ढांचा जोड़ा गया था और लंबाई-चौड़ाई में भी बदलाव के संकेत मिले. परिवहन विभाग के अधिकारियों ने माना कि डिजाइन मानकों का उल्लंघन हुआ है और इसकी विस्तृत जांच जारी है. लखनऊ मंडल के आरटीओ प्रभात पांडे ने कहा कि जांच कराई जा रही है कि बस के अंदर कितनी स्लीपर लगी हैं और कितनी सीट लगी हैं, फिलहाल इसमें पता चल रहा है कि इसके डिज़ाइन के जो मानक हैं, उनका उल्लंघन किया गया है.

67 चालान, फिर भी चलती रही बस

परिवहन रिकॉर्ड के अनुसार, इस बस के 67 चालान लंबित थे, जिनका भुगतान नहीं किया गया था. इसके बावजूद बस पंजाब से बिहार तक करीब 1360 किलोमीटर की दूरी तय करती रही. रास्ते में 50 से अधिक आरटीओ और एआरटीओ क्षेत्रों से गुजरने के बावजूद न पुलिस, न ट्रैफिक और न ही परिवहन विभाग ने प्रभावी कार्रवाई की. यह तथ्य व्यवस्था की निगरानी प्रणाली पर सवाल उठाता है.

नियमों के मुताबिक, लंबी दूरी की बसों में दो ड्राइवर होने चाहिए ताकि थकान से बचा जा सके. लेकिन इस बस में केवल एक ही चालक था, जबकि इसे पंजाब से बिहार तक 1360 किमी की दूरी तक करनी थी. मानक यह भी कहते हैं कि 4.5 घंटे की ड्राइविंग के बाद कम से कम 45 मिनट का ब्रेक और 14 घंटे की ड्यूटी में तीन घंटे का आराम अनिवार्य है. प्राथमिक जानकारी से संकेत मिलता है कि इन नियमों का पालन नहीं किया गया. बिहार निवासी महेश की पत्नी सुलेखा की तहरीर पर चालक के खिलाफ गैर-इरादतन हत्या की धाराओं में एफआईआर दर्ज की गई है. हादसे में सुलेखा के दो बच्चों की मौत हो गई. पुलिस के अनुसार, दुर्घटना के कारणों तेज रफ्तार, वाहन में तकनीकी खामी या चालक की लापरवाही सभी पहलुओं की जांच की जा रही है.

‘रियलिटी चेक’ में भी मिली अनियमितताएं

ये पहली डबल डेकर बस नहीं है, जो हादसे का शिकार हुई है. इससे पहले भी कई डबल डेकर बसों में कभी आग लगने से, तो कभी पलटने यात्रियों की जान गई है. यही नहीं, आज भी देश की सड़कों पर तमाम ऐसी ‘मौत की बसें’ खुलेआम नियमों की धज्जियां उड़ाकर चल रही हैं. इसी को लेकर आजतक ने ये जानने के लिए कि क्यों ये बसें यात्रियों के लिए जानलेवा बन रही हैं, शहर-शहर फिर से डबल डेकर बसों का रिएलिटी चेक किया. इस क्रम में आजतक की टीम ने यूपी की राजधानी लखनऊ, कानपुर, आगरा, प्रयागराज और राजस्थान के जयपुर की बसों का रिएलिटी चेक किया. 

लखनऊ में खुलेआम उड़ाई जा रही नियमों की धज्जियां

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में स्लीपर बसों की हकीकत जानने के लिए आजतक की टीम ट्रांसपोर्ट नगर स्थित पार्किंग नंबर 7 पहुंची. रियलिटी चेक के दौरान सामने आया कि एक या दो नहीं बल्कि कई बसों में मानकों के विपरीत लोहे के एंगल लगाकर अतिरिक्त सामान रखने की व्यवस्था की गई थी. ये बदलाव सुरक्षा मानकों का खुला उल्लंघन थे. जांच के दौरान बसों की छत पर बड़े-बड़े कंटेनर बॉक्स जैसे ढांचे बनाए गए थे, जिनमें सामान भरा जा रहा था. कैमरा देखते ही मौके पर मौजूद लोग वहां से फरार हो गए. जब टीम बस के अंदर पहुंची तो पाया कि इमरजेंसी एग्जिट विंडो के सामने पूरी सीट लगा दी गई थी. 

इतना ही नहीं, एग्जिट विंडो का आकार भी छोटा था और वह पूरी तरह से लॉक थी. आपात स्थिति में उसे खोलने के लिए कोई हैमर भी मौजूद नहीं था, जिससे यात्रियों की जान को गंभीर खतरा हो सकता था. बस के पिछले हिस्से में जहां सामान्यतः एग्जिट विंडो होती है, वहां लेटने के लिए बड़ी सीट लगा दी गई थी, जिसे एक अतिरिक्त पैसेंजर को बुक किया जा सकता था. मौके पर बस का एक कर्मचारी उसी सीट पर सोता हुआ मिला. पूछताछ करने पर वह कैमरे से बचता नजर आया और स्पष्ट जवाब नहीं दे सका. इसके अलावा ‘फौजी डॉट कॉम’ नाम से संचालित एक बस में भी भारी अनियमितताएं पाई गईं. उसमें अतिरिक्त सामान रखने के लिए बड़े लोहे के एंगल लगाए गए थे, जो पूरी तरह मानकों के खिलाफ थे और यात्रियों की सुरक्षा को जोखिम में डाल रहे थे.

कानपुर में आजतक की पड़ताल के बाद एक्शन

कानपुर में आरटीओ विभाग ने सख्त चेकिंग अभियान चलाते हुए यातायात नियमों का उल्लंघन कर रही गाड़ियों के खिलाफ बड़ी कार्रवाई की. मौके पर किए गए आजतक रियलिटी चेक में दो निजी बसों में गंभीर अनियमितताएं सामने आईं, जिसके बाद विभाग ने दोनों बसों का चालान कर कुल 50,000 रुपये का जुर्माना लगाया. पहली बस में गंभीर लापरवाही उजागर रियलिटी चेक के दौरान पहली बस में क्षमता से कहीं अधिक सवारियां बैठी पाई गईं. दो लोगों की सीट पर चार-चार और एक व्यक्ति की सीट पर तीन-तीन यात्रियों को बैठाया गया था. इतना ही नहीं, चलने के लिए बने पैसेज में भी गद्दे लगाकर लोगों को बैठाया गया, जबकि इमरजेंसी गेट के सामने भी यात्रियों को बैठा दिया गया था. दूसरी इमरजेंसी विंडो को लोहे की रॉड लगाकर पूरी तरह ढक दिया गया था, जिससे आपात स्थिति में बाहर निकलना लगभग असंभव था.

यात्रियों ने बताया कि उनसे एक-एक हजार रुपये किराया लेकर एक सीट पर चार-चार लोगों को ठूंस दिया गया. महिला यात्रियों ने शिकायत की कि इमरजेंसी विंडो इतनी छोटी है कि उससे बाहर निकलना संभव नहीं है, जिससे उनकी सुरक्षा को गंभीर खतरा है. दूसरी बस में भी कई खामियां दूसरी बस की जांच में भी कई गंभीर कमियां सामने आईं. बस के बाहर लगाए जाने वाले अनिवार्य रेट्रो रिफ्लेक्टर नहीं थे और अंदर मेडिकल किट भी उपलब्ध नहीं थी. बस के भीतर भारी लोहे का सामान बोरे में भरकर ले जाया जा रहा था, जिससे यात्रियों की जान जोखिम में पड़ सकती थी. जहां इमरजेंसी गेट होना चाहिए था, वहां लोहे की सीट लगाकर रास्ता पूरी तरह बंद कर दिया गया था. 

आगरा की बसों में जोखिम भरा सफर जारी

आगरा में भी बड़े पैमाने पर अतिरिक्त और अवैध सामान लादकर तथा निर्धारित क्षमता से अधिक सवारियां भरकर निजी बसें नियमों की धज्जियां उड़ा रही हैं, जिससे यात्रियों की जान जोखिम में पड़ रही है. आजतक ने जब रियलिटी चेक किया तो पाया कि ईदगाह कटघर रोड पर डबल डेकर बसें जो गुजरात के गांधी धाम तक यात्रियों को ले जाती हैं, वो माल वाहक वाहन बने हुए हैं. वहीं ड्राइवर फर्स्ट एड किट तक नहीं दिखा पाया. हालांकि बस में प्रॉपर एग्जिट प्लान जरूर नजर आया. वहीं आजतक के कैमरे में दुर्गा प्रसाद नाम का एक व्यक्ति और कैद हुआ, जो इन बसों में सामान लादने के लिए जूतों के बॉक्स लेकर आया था. उसने कैमरे पर कबूल किया ये सामान वो इंदौर भेज रहा है. कुल मिलाकर परिवहन विभाग आंखों पर पट्टी बांधे हुए हैं और यात्री बसें माल ढुलाई वाहन बनकर यात्रियों की जिंदगी से खिलवाड़ कर रहीं हैं.

प्रयागराज में भी नियम तोड़कर चल रहीं बसें

प्रयागराज में रोडवेज और प्राइवेट बसों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं. जांच के दौरान दो बसों में जो हालात सामने आए, वे यात्रियों की सुरक्षा के साथ खुला खिलवाड़ साबित होते हैं. आजतक की पड़ताल में पाया गया कि दो बसों में लगे फर्स्ट एड बॉक्स पूरी तरह खाली थे. आपात स्थिति में प्राथमिक उपचार के लिए जरूरी दवाएं और सामग्री नदारद थीं. यह न सिर्फ नियमों का उल्लंघन है, बल्कि यात्रियों की जान को खतरे में डालने जैसा है. बसों में आपातकालीन खिड़कियों को गद्दों और अतिरिक्त सीटों से ढक दिया गया था. कई जगहों पर यात्रियों को इन्हीं खिड़कियों के सामने बैठाया गया था. दुर्घटना की स्थिति में ये अवरोध बाहर निकलने में भारी देरी का कारण बन सकते हैं.

एक बस में यात्री डिब्बे के अंदर ही लोहे के गार्डर रखे मिले. यह गंभीर सुरक्षा उल्लंघन है. अचानक ब्रेक या हादसे की स्थिति में ये भारी सामान जानलेवा साबित हो सकता है. बस की छत और इमरजेंसी एग्जिट के पास यात्रियों और उनके सामान को रखा गया था. यह न केवल ओवरलोडिंग है, बल्कि आपात निकासी मार्ग को अवरुद्ध करना भी है. ड्राइवर और कंडक्टर से बातचीत में सामने आया कि उन्हें सुरक्षा मानकों और फर्स्ट एड किट की अनिवार्यता को लेकर गंभीरता नहीं है. कई कर्मचारियों को यह तक नहीं पता था कि फर्स्ट एड बॉक्स में क्या-क्या होना चाहिए.

राजस्थान में पड़ताल के बाद भी नहीं बदले हालात

राजस्थान में बस ड्राइवर हड़ताल पर हैं, और मांग कर रहे हैं कि बसों की जांच तुरंत रोकी जाए. राजस्थान में बस हादसों में 100 से ज्यादा जानें जाने के बाद आजतक ने सोई सरकार को दस्तक देकर जगाया था कि कैसे नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए निजी मोडिफाई बसें सड़क पर चलता फिरता ताबूत बनकर दौड़ रही हैं. सरकार ने जब जांच शुरू की तो 30 हज़ार बसों ने हड़ताल शुरू कर दी. इसकी वजह से जनता को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है. आजतक ने फिर से बसों की पड़ताल शुरू की.

बस संचालकों का कहना है कि परिवाहन विभाग नए कानून के तहत मोडिफिकेशन को गलत मान रही है. बीच रास्ते में रोक कर बसों को चेक किया जाता है. यात्री परेशान होते हैं. इतना जुर्माना है कि बस चलाने में फ़ायदा नहीं है. उधर, सरकार ने भी हड़ताल पर गए निजी बस संचालकों से बातचीत करने से मना कर दिया है. इन पर आरोप है कि ये न तो बसों में फायर सिलेंडर रखते हैं और न हीं इमरजेंसी गेटों के नियम की पालना करते हैं. सरकार ने इन्हें समय भी दिया लेकिन कुछ पैसों के लालच में यात्रियों की जान जोखिम में डाल देते हैं. आजतक ने जब पड़ताल की तो अभी भी बस में न तो फायर सिलेंडर मिले और न हीं इमरजेंसी गेट खुले.

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