तालिबानी बूमरैंग… पाकिस्तान आर्मी की ‘जिहाद फैक्ट्री’ को आ गया स्वाद

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बीती रात पाकिस्तान ने काबुल, कंधार और पक्तिया में एयर स्ट्राइक कर दी. अफगानिस्तान की तरफ से जवाब आया. आज दिन में तालिबान ने पाकिस्तान के अंदर ड्रोन हमले किए. वो भी पाकिस्तान के तीन सैन्य ठिकानों पर. खबर तो यहां तक आई कि एक अटैक इस्लामाबाद में प्राइम मिनिस्टर ऑफिस से पांच किमी दूर ही हुआ. दोनों देशों के बीच पिछले कुछ महीनों से चली आ रही तीखी बयानबाजी और झड़प अब ’ओपन वार‘ का रूप ले चुकी है. लेकिन, इस दुश्मनी की जड़ पुरानी है. करीब-करीब तब से जब दोनों देशों के बीच डूरंड लाइन खींची गई थी. 1893 से इसे लेकर दोनों तरफ से खींचतान चली आ रही है.

तालिबान इसे मानता नहीं. वही तालिबान, जिसे पाकिस्तान आर्मी ने जिहादी फौज के रूप में जन्म दिया था. पाक आर्मी ने अफगानिस्तान से रूस के पैर उखड़ने के बाद तालिबान का वहां पौधारोपण किया था. जिसने अमेरिका के खिलाफ पाकिस्तान के इशारे पर मोर्चे लिए और आखिर में उसे फतेह भी मिली. लेकिन, अफगानिस्तान की सत्ता हाथ आने के बाद तालिबान ने पाकिस्तानी आर्मी के इशारे पर चलने से इनकार कर दिया है. जब रावलपिंडी, यानी पाकिस्तान आर्मी हेडक्वार्टर को यह नागवार गुजरा तो कलह शुरू हो गई. अब पाकिस्तानी आर्मी का बनाया तालिबान उसी पर बूमरैंग हो रहा है. तालिबान और पाकिस्तान आर्मी के रिश्तों में कई परतें हैं. जिस मिठास है, तो खटास भी. दोस्ती है, तो दुश्मनी भी.

इसलिए, तालिबान और पाकिस्तान के रिश्ते को 3 चैप्टर में समझा जा सकता है. पहले चैप्टर में दोनों देशों की सेनाओं का मिलान है. अफगानिस्तान के पास क्या हथियार हैं और वह पाकिस्तान से किस स्तर पर लड़ सकता है. दूसरा चैप्टर पाकिस्तान के पुराने खेल पर है. कैसे उसने पाकिस्तानी मदरसों में जिहाद के नाम पर कट्टरपंथियों की फौजी बनाई और तालिबान को तैयार किया. और तीसरा चैप्टर पाकिस्तान के आर्मी चीफ फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के वार गेम पर है. जो अपनी कुर्सी मजबूत करने के लिए खूनी खिलवाड़ करने में कोताही नहीं कर रहे हैं.

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पहला चैप्टर: किसमें कितना है दम…

पाकिस्तान की सेना दुनिया में टॉप 15 में गिनी जाती है. ग्लोबल फायर पावर 2026 की रैंकिंग में पाकिस्तान 14वें नंबर पर है. उसके पास करीब 6 लाख 60 हजार एक्टिव सैनिक हैं. हवाई जहाज सैकड़ों में हैं. टैंक और तोपें भी भरपूर हैं. न्यूक्लियर हथियार भी हैं. करीब 170 वॉरहेड. बजट भी बड़ा है. पाकिस्तान की सेना आधुनिक हथियारों से लैस है. एफ-16 जैसे लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर और मिसाइलें सब कुछ है.

दूसरी तरफ अफगानिस्तान की तालिबान फौज का हाल अलग है. उसके पास करीब 1 लाख 72 हजार सक्रिय लड़ाके हैं. योजना है इसे 2 लाख तक बढ़ाने की. लेकिन हथियारों की हालत खराब है. कोई फाइटर जेट नहीं है. हवाई ताकत नाम को भी नहीं. सिर्फ छह पुराने विमान और 23 हेलीकॉप्टर हैं. ज्यादातर सोवियत जमाने के. कई उड़ भी नहीं पाते. रखरखाव का इंतजाम नहीं. अमेरिका के छोड़े गए हथियारों पर निर्भर हैं. 2021 में जब अमेरिका वहां से गया तो 7 अरब डॉलर के हथियार तालिबान के हाथ लगे. M16 राइफलें, हमवी गाड़ियां, नाइट विजन गॉगल्स, कुछ टैंक और APC. सोवियत काल के T-55 और T-62 टैंक भी हैं. करीब सौ T-55 और सौ ही T-62. लेकिन कितने काम के हैं, यह तय नहीं.

तालिबान इन हथियारों से पाकिस्तान से सीधा मुकाबला नहीं कर सकते. पाकिस्तान की एयर फोर्स अकेले ही अफगानिस्तान को तबाह कर सकती है. पाकिस्तान के पास 465 कॉम्बैट एयरक्राफ्ट हैं. तालिबान के पास कोई एयर डिफेंस सिस्टम नहीं जो इन हमलों को रोक सके. इसलिए तालिबान पारंपरिक युद्ध नहीं लड़ता. वह गुरिल्ला युद्ध का माहिर है.

Pak Vs Afghan army and weapons

पाक सेना कांप क्यों रही है?

खैबर-पख्तूनख्वा और डूरंड लाइन पर जंगल, घाटियां और ऊबड़-खाबड़ रास्ते हैं. यहां पाकिस्तानी आर्मी का टिकना मुश्किल है. तालिबान लड़ाके लोकल हैं. उन्हें हर गली, हर पहाड़ी का पता है. वे हिट एंड रन करते हैं. IED लगाते हैं. अचानक हमला करके भाग जाते हैं. पाकिस्तान की सेना जब ऑपरेशन चलाती है तो तालिबान पीछे हट जाता है. फिर पीछे से हमला कर देता है.

खैबर-पख्तूनख्वा जैसे इलाकों में तालिबान पाकिस्तानी आर्मी को टिकने नहीं दे रहा है. यहां टीटीपी यानी तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान भी एक्टिव है. पाकिस्तानी आर्मी की चिंता अफगानिस्तान की ओर से हो रही बमबारी नहीं है. उनका खून सूख रहा है आत्मघाती हमले के डर से. सड़क किनारे बम धमाका. रोज कई पाकिस्तानी सैनिकों की मौत हो रही है. सेना को हर मोर्चे पर अलर्ट रहना पड़ता है. इससे पाकिस्तान की सेना थक रही है. संसाधन बर्बाद हो रहे हैं.

पश्तून और टीटीपी सपोर्ट बने तालिबान के हथियार

पाक-अफगान सीमा पर मौजूद पश्तून इलाकों में तालिबान को अच्छा समर्थन मिलता है. दोनों तरफ पश्तून हैं. रिश्तेदारी, भाषा और कल्चर एक जैसा. कई पश्तून पाकिस्तान की पुरानी सैन्य कार्रवाइयों से नाराज हैं. जब पाकिस्तान ने दस साल पहले जर्ब-ए-अज्ब जैसे ऑपरेशन चलाए तो आम लोगों के घर उजड़ गए. और स्थानीय लोग तालिबान या टीटीपी की तरफ झुक गए. वे तालिबान को भाई मानते हैं. खाना देते हैं. छिपने की जगह देते हैं. खुफिया जानकारी देते हैं. यही समर्थन तालिबान को मजबूत बनाता है.

टीटीपी तालिबान के लिए सबसे बड़ा मददगार बन गया है. टीटीपी के 30 से 35 हजार लड़ाके हैं. ये अफगान तालिबान के साथ विचारधारा में एक हैं. अफगान तालिबान टीटीपी को अफगानिस्तान में शरण देता है. उन्हें ट्रेनिंग देता है. हथियार देता है. कहा तो यहां तक गया है कि अमेरिका जितने हथियार अफगानिस्तान में छोड़कर गया था, उसमें बड़ी तादाद टीटीपी को या तो दे दी गई, या बेच दी गई. बदले में टीटीपी पाकिस्तान के अंदर हमले करता है. इससे पाकिस्तानी आर्मी को दो मोर्चे पर लड़ना पड़ता है. एक सीमा पर तालिबान से, दूसरा अंदर टीटीपी से. टीटीपी ने 2025 में हमलों में 90 प्रतिशत बढ़ोतरी की. टीटीपी की वजह से पाकिस्तान की सेना व्यस्त रहती है, और तालिबान को सांस लेने का मौका मिलता है.

कुल मिलाकर, पाकिस्तान पारंपरिक युद्ध में बहुत आगे है. लेकिन तालिबान लंबे गुरिल्ला युद्ध में पाकिस्तान का खून चूस सकता है. पहाड़, लोकल सपोर्ट और टीटीपी का साथ तालिबान के पक्ष में है. यही वजह है कि पाकिस्तान अब खुले हमले कर रहा है. लेकिन यह खेल खतरनाक है.

दूसरा चैप्टर: जिहाद जो अब बूमरैंग हो रहा है

पाकिस्तान आर्मी जिहादियों की फौजी खड़ी करने में एक्सपर्ट मानी जाती है. 70 के दशक में जनरल जिया उल हक ने देश को इस्लामिक रंग दिया. 1979 में जब सोवियत रूस ने अफगानिस्तान पर कब्जा किया, तो पाकिस्तान ने मौका देखा. उसने मुजाहिदीनों की फौज खड़ी की. इन जिहादी लड़ाकों को अमेरिका और सऊदी अरब से पैसे और हथियार लेकर ISI यानी पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ने ट्रेनिंग दी. फिर इन्हें अफगानिस्तान भेजा गया. रूस के खिलाफ लड़ाई लड़ी गई. 1989 में रूस हारकर चला गया.
लेकिन पाकिस्तान का खेल यहीं खत्म नहीं हुआ. रूस के जाने के बाद अफगानिस्तान में गृह युद्ध शुरू हो गया. अलग-अलग गुट आपस में लड़ने लगे. पाकिस्तान ने फिर एक नई फौज तैयार की. 1994 में तालिबान का जन्म हुआ. ISI ने इसे पाला. मदरसों से लड़के इकट्ठा किए. उन्हें ट्रेनिंग दी. हथियार दिए. मकसद था अफगानिस्तान में पाकिस्तान का दोस्त सरकार बनाना. सोच ये थी कि इससे भारत के खिलाफ पाकिस्तान को एक रणनीतिक गहराई मिलेगी. 1996 में तालिबान ने काबुल पर कब्जा कर लिया. पाकिस्तान ने तुरंत मान्यता दी.

9/11 के बाद अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमला किया. तालिबान अंडरग्राउंड हो गया. पाकिस्तान ने दुनिया को बताया कि वह अमेरिका का साथी है. लेकिन अंदर से तालिबान की मदद जारी रखी. क्वेटा में तालिबान का हेडक्वार्टर बन गया. ISI ने शरण दी. ट्रेनिंग कैंप चलाए. हथियार पहुंचाए. अमेरिका के खिलाफ लड़ाई में तालिबान को मजबूत किया. मकसद था अमेरिका को कमजोर करना और अफगानिस्तान में फिर तालिबान की सरकार लाना. 

20 साल तक यह खेल चला. 2021 में अमेरिका गया. तालिबान वापस आ गया. पाकिस्तान खुश था. सोचा था अब दोस्त सरकार है. एक तरफ तालिबान सत्ता संभाल रहा था, जो तबके आईएसआई चीफ काबुल की होटल में चाय का प्याला लिए फोटो खिंचवा रहे थे. मानो कह रहे हों कि अब यहां का रिमोट कंट्रोल उनके हाथ में है. पाकिस्तान को यही ओवर-कान्फिडेंस भारी पड़ गया. तालिबान ने पाकिस्तान के इशारे मानने से इनकार कर दिया. डूरंड लाइन को नहीं माना. टीटीपी को शरण दी. अब वही तालिबान पाकिस्तान पर हमले करवा रहा है. टीटीपी ने पाकिस्तान के अंदर आतंक फैला दिया है.

पाकिस्तान का यह पुराना खेल अब उसके खिलाफ पड़ गया. जो फौज उसने बनाई थी, वही उस पर बूमरैंग हो गई. डिफेंस एक्सपर्ट क्रिस्टीन फेयर ने कहा था कि पाकिस्तान ने हमेशा जिहादियों को इस्तेमाल किया लेकिन कंट्रोल नहीं रख पाया. आज वही हो रहा है.
Pak-Afghan Books

तीसरा चैप्टर: मुनीर का ‘मनपसंद’ वार गेम

मई 2025 में भारत से चार दिन की जंग के बहाने पाक आर्मी चीफ आसिम मुनीर ने पहले अपनी कुर्सी मजबूत की. पाकिस्तान ने जीत का दावा किया और मुनीर को फील्ड मार्शल बना दिया गया. फिर चीफ ऑफ डिफेंस फोर्स भी. अब अफगानिस्तान पर हमले कर रहे हैं.

रोज DG ISPR प्रेस में आते हैं. कहते हैं कि आर्मी पूर्वी बॉर्डर पर भारत से और पश्चिमी पर अफगानिस्तान से लड़ रही है. पाकिस्तान को बचा रही है. मुनीर ने कहा कि अफगान तालिबान को टीटीपी और पाकिस्तान में से एक चुनना होगा. 70 प्रतिशत टीटीपी घुसपैठिए अफगान हैं.

लेकिन असली खेल अंदर है. आर्मी साबित कर रही है कि इमरान खान और उनके समर्थक भी खतरा हैं. DG ISPR अहमद शरीफ चौधरी ने दिसंबर 2025 में कहा कि खान की नरेटिव नेशनल सिक्योरिटी थ्रेट बन गई है. खान को मानसिक रूप से अस्थिर बताया. आर्मी कह रही है कि अगर हम न रहे तो पाकिस्तान का वजूद खतरे में पड़ जाएगा.

डिफेंस एक्सपर्ट आयेशा सिद्दीका कहती हैं कि ‘मुनीर ने पूरा कंट्रोल अपने हाथ में ले लिया है’. इंटरनेशनल ऑब्जर्वर जैसे क्राइसिस ग्रुप के लोग कहते हैं कि ‘मुनीर घरेलू समस्याओं से ध्यान हटाने के लिए बाहर जंग का राग अलाप रहे हैं. अर्थव्यवस्था खराब है. इमरान समर्थक प्रदर्शन कर रहे हैं. बलूच नागरिकों की बगावत जारी है. आर्मी दोनों इंटरनेशनल बार्डर पर लड़ने का ढोल पीट रही है ताकि लोग सोचें कि सिर्फ सेना ही देश बचा सकती है.’

कुल मिलाकर मुनीर ने भारत और अफगानिस्तान के नाम पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली है. लेकिन यह खेल खतरनाक है. जो फौज उसने बनाई, वही अब उलट रही है. डूरंड लाइन पर लड़ाई बढ़ेगी. टीटीपी हमले जारी रखेगा. आम पाकिस्तानी मरेंगे. इतिहास गवाह है कि पाकिस्तान का यह पुराना खेल हमेशा उल्टा पड़ता है. लेकिन एक हकीकत यह भी है कि इसी से पाकिस्तानी आर्मी को अपना वजूद कायम रखने की वजह भी मिलती है.

अब बड़ा सवाल यह है कि तालिबान के बूमरैंग से पाकिस्तान कैसे बचेगा. तालिबान को कंट्रोल करने की कोशिश में वह खुद घिरता जा रहा है. पाकिस्तान ने जो खेल शुरू किया, वह खुद उसी में फंस गया. अब खुले युद्ध का ऐलान हो चुका है. आगे क्या होगा, यह समय बताएगा. लेकिन एक बात साफ है. पुराना साथी अब दुश्मन बन चुका है.

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