Updated: Sun, 15 Mar 2026 08:13 AM (IST)
हल्द्वानी के बेस अस्पताल में एलपीजी सिलेंडरों की कमी से मरीजों के भोजन का संकट गहरा गया है। तीन में से दो सिलेंडर खाली हैं, और तीसरे में भी गैस खत्म ह …और पढ़ें

छात्रावास में चूल्हे पर बन रहा खाना. Jagran

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
संक्षेप में पढ़ें
जागरण संवाददाता, हल्द्वानी। एक तरफ दावा किया जा रहा है कि स्कूलों और अस्पतालों को प्राथमिकता के आधार पर व्यावसायिक सिलिंडर दिया जाएगा, लेकिन दूसरी तरफ जमीनी हकीकत अलग ही नजर आ रही है। स्कूलों, अस्पतालों में या तो सिलिंडर खत्म हो गए हैं या खत्म होने की कगार पर हैं। बेस अस्पताल में तीन में से दो सिलिंडर खाली हो गए हैं। आखिरी सिलिंडर में भी रविवार तक ही खाना बनाने की गैस बची है। अगर अस्पताल को सिलिंडर नहीं मिला तो सोमवार से मरीजों के खाने का संकट पैदा हो सकता है।
बेस अस्पताल में मरीजों के लिए सुबह, दोपहर और शाम का भोजन बनता है। अभी अस्पताल में लगभग 60 मरीज भर्ती हैं, लेकिन अस्पताल की कैंटीन में रविवार का भोजन बनाने लायक ही गैस बची है। यहां आमतौर पर एक सिलिंडर से चार से पांच दिन का खाना बन जाता है। अस्पताल के पीएमएस केएस दत्ताल ने दो सिलिंडर की मांग को लेकर सीएमओ को पत्र भेजा है, लेकिन अभी तक सिलिंडर का इंतजाम नहीं हो सका है। सीएमओ डा. हरीश चंद्र पंत ने बताया कि सरकारी और निजी अस्पतालों से सिलिंडर की जितनी भी मांगें आई हैं, वे इंडेन और भारत के प्रबंधक को भेज दी गई हैं।
एसटीएच को मिले दो सिलिंडर
सुशीला तिवारी अस्पताल के चिकित्स अधीक्षक डा. अरुण जोशी ने बताया कि अस्पताल की कैंटीन के लिए दो व्यावसायिक सिलिंडर मिल गए हैं। ऐसे में अभी मरीजों को भोजन मिलता रहेगा। वहीं महिला अस्पताल की सीएमएस डा. उषा जंगपांगी ने बताया कि अभी अस्पताल की कैंटीन में एक सिलिंडर है। इसके अलावा कैंटीन संचालक ने एक इंडक्शन चूल्हा भी खरीद लिया है।
नैन्सी कान्वेंट स्कूल के छात्रावास में चूल्हे पर बन रहा खाना
स्कूलों के छात्रावास में भी व्यावसायिक सिलिंडर खत्म हो गए हैं। ऐसे में उन्हें चूल्हे में खाना बनाना पड़ रहा है। ज्योलीकोट स्थित नैन्सी कान्वेंट स्कूल के छात्रावास में पांच दिन से सिलिंडर खत्म हो गए हैं, जबकि यहां प्रतिदिन 700 बच्चों का खाना बनाया जाता है। यहां प्रतिमाह 900 व्यावसायिक सिलिंडर की जरूरत होती है।
पत्थर के कोयले और लकड़ी की मांग में आया उछाल
होटल और रेस्तरां को व्यावसायिक सिलिंडर नहीं मिल रहा है, जिस कारण लकड़ी और कोयले पर उनकी निर्भरता बढ़ गई है। वे लकड़ी और कोयले में खाना बना रहे हैं। इसमें भी पत्थर के कोयले की मांग में अधिक इजाफा देखने को मिला है।
कोयला और लकड़ी कारोबारी सद्दाम हुसैन ने बताया कि पत्थर के कोयले से आंच ज्यादा आती है। इसके साथ ही ये थोड़ा देर तक जलते हैं। ऐसे में होटल, रेस्तरां, ठेले वालों की मांग बढ़ गई है। जहां पहले पत्थर का कोयला चार से पांच क्विंटल प्रतिदिन बिकता था, वहीं अब 14 से 15 क्विंटल प्रतिदिन बिक रहा है। इसी तरह लकड़ी के कोयले की भी बिक्री 10 से 12 क्विंटल से बढ़कर 20 से 22 क्विंटल हो गई है। वहीं लकड़ी की बात करें तो पहले दो से तीन क्विंटल लकड़ी प्रतिदिन बिकती थी, जो अब 10 से 12 क्विंटल तक बिक रही है।
यह भी पढ़ें- शादियों पर भारी पड़ी गैस की किल्लत: कहीं कोयले के धुएं में उठी बेटी की डोली, तो कहीं टालनी पड़ी बेटे की शादी
यह भी पढ़ें- उत्तराखंड में सौर रसोई क्रांति: गैस संकट के बीच 15,000 घरों को मिली राहत

