बरसों बाद लौटा ऐसा इत्तेफाक: दो ‘अलविदा जुमा’ ने बढ़ाई ईद की रूहानियत

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बरसों बाद लौटा ऐसा इत्तेफाक: दो ‘अलविदा जुमा’ ने बढ़ाई ईद की रूहानियत

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दो अलविदा जुमा पड़ने से इस बार की ईद होगी खास कई वर्षों के अंतराल

बरसों बाद लौटा ऐसा इत्तेफाक: दो 'अलविदा जुमा' ने बढ़ाई ईद की रूहानियत

दो अलविदा जुमा पड़ने से इस बार की ईद होगी खास कई वर्षों के अंतराल के बाद आया है ऐसा संयोगहल्द्वानी, संवाददाता। रमजान-उल-मुबारक के मुकद्दस महीने के अंतिम दौर में इस बार एक ऐसा दिलचस्प संयोग बना है, जिसने मुस्लिम समुदाय के बीच खासा उत्साह पैदा कर दिया है। अमूमन रमजान के आखिरी शुक्रवार को ‘अलविदा जुमा’ कहा जाता है, लेकिन इस बार कैलेंडर और चांद की तारीखों के तालमेल से दो जुमा (शुक्रवार) अलविदा की श्रेणी में आ गए हैं।धार्मिक दृष्टि से रमजान का आखिरी जुमा, जिसे जुमात-उल-विदा कहा जाता है, बेहद अहम माना जाता है। इस दिन मस्जिदों में इबादत का विशेष महत्व होता है और बड़ी संख्या में लोग नमाज अदा करते हैं।

दो जुमा का संयोग कहा जा रहा है। हालांकि इस्लामी नियमों के अनुसार यदि ईद का दिन जुमे को पड़ता है तो उस दिन जुमे की नमाज की जगह ईद की विशेष नमाज अदा की जाती है, फिर भी यह कैलेंडर संयोग लोगों के लिए खास मायने रखता है।शहर की मस्जिदों में इन दिनों नमाजियों की संख्या में इजाफा साफ देखा जा रहा है। बाजारों में भी रौनक बढ़ गई है, कपड़ों, सेवइयों और इत्र की दुकानों पर खरीदारी तेज हो गई है। रोजेदार इबादत के साथ-साथ ईद की तैयारियों में भी जुटे हैं। धार्मिक जानकारों का मानना है कि ऐसे संयोग इबादत के लिहाज से खास मौके लेकर आते हैं, क्योंकि रमजान के अंतिम दिनों में की गई इबादत को अत्यंत विशेष सवाब वाला माना जाता है। ऐसे में लगातार दो अलविदा जुमा का पड़ना लोगों को ज्यादा से ज्यादा समय इबादत में बिताने का अवसर देता है। इस बार का यह विशेष संयोग पहले से ही लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है और पूरे माहौल को एक अलग ही रूहानी रंग दे रहा है।कोट -जामा मस्जिद में शहर इमाम शेख मुफ्ती मो. आजम कादरी ने बताया कि इस तरह का संयोग कोई पहली बार नहीं है, लेकिन यह अक्सर कई वर्षों के अंतराल के बाद देखने को मिलता है। जब रमजान का महीना इस तरह से आता है कि उसका अंतिम जुमा और ईद के आसपास का समय एक ही सप्ताह में समाहित हो जाए, तब ऐसा माहौल बनता है। पिछले वर्षों में भी ऐसा संयोग तब बना था जब ईद जुम्मे के करीब आई थी, लेकिन हर बार इसकी अवधि और प्रभाव अलग-अलग रहे हैं। आम तौर पर इस तरह का पैटर्न 10-12 साल या उससे अधिक के अंतराल में देखने को मिलता है, क्योंकि इस्लामी कैलेंडर चंद्रमा पर आधारित होता है और हर साल लगभग 10-11 दिन पीछे खिसकता है।ईद की नमाज प्रात: 8.30 बजेईद की नमाज ईदगाह में शनिवार को सुबह 8.30 बजे पढ़ी जायेगी। जामा मस्जिद में सुबह 9 बजे ईद-उल-फितर की नमाज होगी।फोटो::24

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