बोले हल्द्वानी: गौलापार-चोरगलिया रेलवे फाटक पर ओवरब्रिज की मांग को लेकर अब आर-पार के आंदोलन की तैयारी
हल्द्वानी में गौलापार-चोरगलिया मार्ग पर रेलवे फाटक ने हजारों लोगों की जिंदगी को कठिन बना दिया है। 2018 से रेल ओवरब्रिज की प्रतीक्षा कर रही जनता अब आंदोलन की तैयारी कर रही है। जाम की स्थिति और समय की बर्बादी से लोग परेशान हैं, जबकि प्रशासनिक लापरवाही इस समस्या को और बढ़ा रही है।
हल्द्वानी, भूपेश कन्नौजिया। शहर से सटे गौलापार-चोरगलिया मार्ग पर रेलवे फाटक अब महज एक क्रॉसिंग नहीं, बल्कि हजारों जिन्दगियों की रोजमर्रा की जंग का केंद्र बन चुका है। साल 2018 से रेल ओवरब्रिज की बाट जोह रही क्षेत्रीय जनता के लिए यह फाटक हर दिन समय की बर्बादी, मानसिक तनाव और अव्यवस्था की एक ऐसी अनचाही सजा बन गया है, जिसका समाधान विकास के बड़े-बड़े दावों के बीच कहीं गुम है। हर दिन यहां लगने वाला घंटों के जाम न केवल 25 हजार की आबादी का धैर्य परख रहा है, बल्कि सिस्टम की उस सुस्ती को भी उजागर किया है जिसने एक जीवनरेखा को ‘अवरोध’ में बदल कर रख दिया है।
अब आश्वासनों से थक चुकी जनता का गुस्सा सातवें आसमान पर है और समाधान न होने पर आर-पार के आंदोलन की तैयारियां तेज हो गईं हैं।एक तरफ शहर का जाम दूसरी ओर वनभूलपुरा की रेलवे क्रासिंग हर दिन, हर घंटे लोगों से उनका समय ही नहीं, बल्कि उनका संयम, उनकी ऊर्जा और कई बार उनकी उम्मीदें भी छीन लेता है। जैसे ही ट्रेन के आने की सूचना होती है, फाटक बंद होता है और उसके साथ ही थम जाती है जिन्दगी की रफ्तार। देखते ही देखते दोनों ओर वाहनों की लंबी कतारें लग जाती हैं। दोपहिया वाहन चालक पसीने से तरबतर, ऑटो में बैठे यात्री बेचैन, और एम्बुलेंस में सवार मरीज समय के खिलाफ जंग लड़ते हुए। एक ट्रेन गुजरती है, लेकिन उसके बाद खुलने वाले फाटक से पहले ही जाम की ऐसी बिसात बिछ जाती है कि कम से कम 15 से 20 मिनट यूं ही सड़कों पर जलते-गलते गुजर जाते हैं।विडंबना यह है कि यह समस्या केवल अवसंरचना की कमी नहीं, बल्कि मानवीय लापरवाही का भी नतीजा है। फाटक बंद होते ही लोग अपनी लेन में रुकने के बजाय दोनों ओर से वाहन घुसा देते हैं, जिससे फाटक खुलते ही रास्ता ‘क्रॉस-जाम’ में बदल जाता है। नतीजा जो रास्ता मिनटों में खुल सकता था, वह आधे घंटे की परीक्षा बन जाता है।यह मार्ग कोई साधारण रास्ता नहीं है। गौलापार की 11 ग्राम पंचायतों के करीब पच्चीस हजार की आबादी के अलावा चोरगलिया सहित खटीमा, नानकमत्ता, टनकपुर, चम्पावत, पिथौरागढ़, मुनस्यारी और धारचूला जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों को हल्द्वानी से जोड़ती है। जब शहर में ट्रैफिक डायवर्ट होता है, तो इस मार्ग पर दबाव कई गुना बढ़ जाता है। ऐसे में यह रेलवे फाटक पूरे क्षेत्र की जीवनरेखा पर ‘बॉटलनेक’ बनकर खड़ा हो जाता है।14 सितंबर 2024 की आपदा ने इस समस्या को और विकराल बना दिया। रेलवे फाटक से कुछ दूरी पर स्थित पुल तक का रास्ता गौला नदी में समा गया, जिससे मार्ग पहले से अधिक संकरा हो गया। यद्यपि प्रशासन की ओर से सुधार कार्यों की कवायद जारी है, लेकिन लोगों की नाराजगी का मूल कारण अब भी जस का तस है, ओवरब्रिज का न बन पाना।यह मुद्दा नया नहीं है। वर्षों से सामाजिक कार्यकर्ता, जनप्रतिनिधि और स्थानीय लोग इस समस्या को उठाते आए हैं। आश्वासन भी मिले, योजनाएं भी बनीं, लेकिन जमीन पर कुछ ठोस नहीं उतरा। अब हालात यह हैं कि जनता का गुस्सा सातवें आसमान पर है और यह गुस्सा केवल ट्रैफिक जाम का नहीं, बल्कि उपेक्षा का है। किसी की जिंदगी पर भारी न पड़ जाए ‘20 मिनट की यह बेबसी’सबसे गंभीर पहलू वह है, जब यह जाम किसी की जिंदगी पर भारी पड़ता है। कई बार मरीजों को अस्पताल पहुंचाने में देरी हो जाती है। परीक्षार्थी समय पर केंद्र तक नहीं पहुंच पाते। और आम लोग, जो रोज इस मार्ग से गुजरते हैं, उनके लिए यह फाटक एक ‘अनचाही दिनचर्या’ बन चुका है। धूप हो या बारिश, और ऊपर से पास में जलते कूड़े का धुआं इन सबके बीच खड़े लोग अब सिर्फ इंतजार नहीं करते, बल्कि भीतर ही भीतर व्यवस्था से सवाल भी करते हैं। अब सवाल यह नहीं कि समस्या क्या है सवाल यह है कि समाधान कब होगा? क्या इस फाटक पर रेल ओवर ब्रिज का सपना हकीकत बनेगा, या यह मुद्दा भी फाइलों में दबकर रह जाएगा? जब तक इस सवाल का जवाब नहीं मिलता, तब तक गौलापार-चोरगलिया का यह रेलवे फाटक यूं ही हर दिन, हर घंटे लोगों की जिन्दगी से 20 मिनट चुराता रहेगा और बदले में देता रहेगा सिर्फ धूल, धुआं और बेबसी।हर ट्रेन पर 15 मिनट… बंद होने वाला रेलवे फाटक रोजाना ‘5 घंटे’ निगल रहा1 जनवरी 2026 से लागू रेलवे टाइम टेबल को अगर ध्यान से पढ़ा जाए, तो यह फाटक रोजाना कितनी देर बंद रहता है, इसका सीधा और चौंकाने वाला गणित सामने आ जाता है। इस रूट पर रोजाना हल्द्वानी से लालकुआं और लालकुआं से हल्द्वानी की ओर करीब 20 ट्रेनें गुजरती हैं। हर ट्रेन पर 15 मिनट बंद होने से यह फाटक हर दिन 300 मिनट यानि पांच घंटे बंद रहता है। कहानी यहीं खत्म नहीं होती। फाटक खुलने के बाद जो हालात बनते हैं, वही असली संकट है। दोनों ओर से बेतरतीब घुसते वाहन, संकरी हो चुकी सड़क और बढ़ता ट्रैफिक 15 मिनट के बंद को अक्सर 30 मिनट के जाम में बदल देता है। यानि एक ट्रेन गुजरने का असर आधे घंटे तक सड़कों पर दिखाई देता है। वाहन चालकों के गुस्से का शिकार होते हैं गेट मैन आम लोगों में अक्सर यह धारणा रहती है कि गेटमैन ही अपनी मर्जी से फाटक खोलता और बंद करता है, लेकिन हकीकत इससे काफी अलग और तकनीकी है। रेलवे स्टेशन अधीक्षक अनिल कुमार के अनुसार यह पूरा सिस्टम एक तय प्रक्रिया के तहत चलता है, जिसमें गेटमैन की भूमिका सीमित होती है और असली नियंत्रण सिग्नल और स्टेशन सिस्टम के पास होता है। जब किसी ट्रेन के आने की सूचना मिलती है तो सबसे पहले स्टेशन की ओर से गेट बंद करने का निर्देश दिया जाता है। इस निर्देश के बाद गेटमैन सड़क पर वाहनों को रोककर फाटक बंद करता है। यहीं तक उसकी मुख्य जिम्मेदारी होती है। फाटक बंद करने के तुरंत बाद वह फोन के माध्यम से अपने कार्यालय को सूचित करता है कि गेट बंद कर दिया गया है। इसके बाद पूरा कंट्रोल केबिन सिस्टम के हाथ में चला जाता है। सिस्टम के जरिए फाटक को लॉक कर दिया जाता है, ताकि उसे बीच में कोई खोल न सके और ट्रेन सुरक्षित तरीके से गुजर सके। ट्रेन गुजरने के बाद भी गेटमैन अपने आप फाटक नहीं खोल सकता। पहले स्टेशन मास्टर के आदेश पर सिस्टम से गेट को अनलॉक किया जाता है और फिर फोन के जरिए गेटमैन को सूचना दी जाती है कि अब फाटक खोला जाता है। इसके बाद ही गेटमैन फाटक खोलता है।पांच शिकायतेंफाटक बंद होने पर लंबा जाम और समय की भारी बर्बादीट्रैफिक अनुशासन की कमी, दोनों ओर से वाहनों का अतिक्रमणसड़क का संकरा होना और वैकल्पिक मार्गों की कमीएम्बुलेंस व आपात सेवाओं का जाम में फंसनावर्षों से रेल ओवर ब्रिज का निर्माण लंबितपांच सुझाव जल्द से जल्द रेल ओवर ब्रिज का निर्माण शुरू किया जाएफाटक के पास ट्रैफिक पुलिस की स्थायी तैनाती होबैरिकेडिंग और लेन सिस्टम को सख्ती से लागू किया जाएआपातकालीन वाहनों के लिए अलग लेन सुनिश्चित की जाएवैकल्पिक मार्गों का विकास और चौड़ीकरण किया जाएबोले लोग – वर्ष 2018 से लगातार ज्ञापन देते आ रहे हैं, आश्वासन तो छोड़िए एक बार किसी रेलवे के अधिकारी ने सुध लेना भी उचित नहीं समझा। अगर अप्रैल तक कोई सुनवाई नहीं हुई तो गौलापार की जनता एक व्यापक आंदोलन की राह पकड़ेगी।अर्जुन बिष्ट, जिला पंचायत सदस्य प्रतिनिधि व पूर्व क्षेत्र पंचायत सदस्यसुबह ग्यारह बजे के आस-पास दो ट्रेनें पास होती हैं जिसकी वजह से आधा घंटे तक फाटक खुलने का इंतजार करना पड़ता है। नवीन शर्मा, निवासी गौलापार खेड़ारेलवे फाटक तो समस्या है ही साथ ही लोगों का दोनों लेन पर वाहन खड़ा करना और फाटक खुलते ही क्रॉस ओवर करना बेहद खलता है। इससे जाम का समय और अधिक बढ़ जाता है।नारायण सिंह, निवासी गंगापुर, गौलापारसुबह नौ बजे और रात आठ बजे सबसे ज्यादा समस्या होती है इस वक्त काफी भीड़ होती है जिसकी वजह से खेड़ा तक पहुंचने में ही एक घंटा लग जाता है।प्रकाश बिष्ट, कुंवरपुर, गौलापाररेल ओवर ब्रिज बन जाए तो कम से कम मरीज को सही वक्त पर अस्पताल ले जा सकते हैं कई बार एंबुलेंस से मरीज को उतारकर फिर दूसरे वाहन से अस्पताल ले जाना पड़ता है।बालम सिंह बर्गली, सेला भावर, गौलापारजनप्रतिनिधियों- अधिकारियों को यह मंजर नजर नहीं आता जबकि कई बार वह अंतरराष्ट्रीय स्टेडियम और हवाई सेवा का लाभ लेने पहुंचते हैं। हीरा सिंह बिष्ट, पूर्व प्रधान नवाड़ खेड़ा, गौलापारमुख्यमंत्री धामी को इस विषय से अवगत कराया था जिस पर उन्होंने रेलवे के अधिकारियों से बात कर ब्रिज बनाए जाने की बात कही थी मगर दो वर्ष बीत जाने के बावजूद आज तक कुछ नहीं हुआ।सुनील कोकिला, नवाड़ खेड़ा, गौलापाारअगर रेलवे स्टेशन का विस्तार होता है तो पहले ब्रिज का निर्माण किया जाना चाहिए ताकि लोगों को इस समस्या से निजात मिल सके।घनश्याम शर्मा, मुखानी, हल्द्वानीमैंने खुद कई बार ऐसे छात्रों को देखा है जो देरी के चलते फाटक के नीचे से स्कूटी-बाइक निकालने का प्रयास करते हैं ऐसे में कई बार बड़ा हादसा होते-होते बचा है।धर्मेंद्र जंगी, चोरगलियाबिना आंदेलन की राह पकड़े लगता है गौलापार निवासियों को राहत नहीं मिलने वाली, अप्रैल में एक बड़ा आंदोलन करेंगे।हरीश, कुंवरपुरमेरे लिए यह फाटक एक अभिशाप है, इसकी वजह अतीत में हुआ एक हादसा है जिसे मैं सामने नहीं रखना चाहता बस इतना कह सकता हूं कि काश उस दिन ट्रेन आने की वजह से फाटक बंद न होता तो मेरा एक बड़ा नुकसान टल जाता।सुभाष पड़लिया, देवला मल्लागौलापार स्टेडियम और हेली सेवा के लिए पहचाने जाने लगा है ऐसे में वीआईपी लोगों की आवाजाही रहती है मगर एक अदद रेल ओवर ब्रिज बनाए जाने की ओर किसी का भी ध्यान नहीं जाता ये बड़ा सवाल है।मोहन राम, देवला मल्लारोजाना जाम में फंसना आम है, इसलिए मैं अब ट्रेन के आने के समय को देखने के बाद ही उससे 20 मिनट पूर्व ही काम के लिए बाहर निकलता हूं इससे समय और पेट्रोल की बचत हो जाती है।रमेश दुम्का, देवला मल्लाफाटक बंद होने के चलते कई बार हमें पैदल ही ऑटो से उतरकर बाजार तक जाना पड़ता है जबकि ऑटो वाला किराया पूरा लेता है। कम से कम आधा घंटा फाटक पर कौन ऑटो में बैठा रह सकता है आप ही बताइए।दुर्गा, सीतापुरसांसद महोदय ने इस समस्या से निजात दिलाने का वायदा किया था लेकिन शायद वे भूल गए, अब हमें भी उनको चुनावों में भूलना होगा।आनंदी देवी, किशनपुरएक तो मार्ग पहले ही संकरा है उस पर यह फाटक कोढ़ में खाज के सामान है।भावना जोशी, मदनपुरहर चुनाव में नेताओं को इस दुश्वारी की याद आती है लेकिन चुनाव के बाद उनकी याददाश्त से यह बात उतर जाती है।रमेश जोशी, मदनपुरगौलापार और चोरगलिया की जनता को यहीं धरने पर बैठना होगा उसके बाद ही शायद कोई कार्रवाई हो। ऐसे आसानी से ब्रिज बनता नजर नहीं आ रहा।किशन सिंह, सीतापुरअभी ट्रेनें कम हैं तो यह हाल है, जब विस्तार होगा तो यह समस्या और बदतर हो जाएगी, बिंदुखत्ता के लोग भी ऐसे ही परेशान हैं।नंदन सिंह बिष्ट, प्रतापपुरचिलिचलाती गर्मी में हेलमेट पहनकर फाटक खुलने का इंतजार करना ठीक ऐसा है मानो जैसे किसी मनोकामना का पूर्ण होना।प्रीतम सिंह बिष्ट, प्रतापपुरबोले जिम्मेदारवनभूलपुरा क्रासिंग के पास अंडर पास स्वीकृत है। जब वहां से अतिक्रमण हट जाएगा तो अंडर पास का काम शुरू किया जाएगा।संजीव शर्मा, सीनियर डीसीएम, इज्जत नगर मंडल, बरेली


