Updated: Sat, 04 Apr 2026 08:35 AM (IST)
हल्द्वानी में वन निगम ने व्यापारिक उद्देश्यों से बेलबाबा क्षेत्र में 50 साल पुराने 41 हजार सागौन और खैर के पेड़ काट दिए, जिससे 73.10 करोड़ रुपये का रा …और पढ़ें

रामपुर राेड स्थित बेलबाबा मंदिर के सामने लगे थे 121 हेक्टेयर में 50 वर्ष पुराने पेड़।

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जागरण संवाददाता, हल्द्वानी । जलवायु परिवर्तन का असर पूरी दुनिया में असर दिखा रहा है। राज्य में ही तेजी से पिघलते ग्लेशियर, असमय बारिश और बढ़ती गर्मी इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है।
ऐसे में जहां जब जलवायु को नियंत्रित करने के लिए एक-एक पेड़ जरूरी है, वहीं कुमाऊं के प्रवेश द्वार हल्द्वानी में वन निगम ने अपने व्यापार के लिए 50 वर्ष पुराने 41 हजार पेड़ों पर बेरहमी से आरी चला दी।
121 हेक्टेयर में लगे थे सागौन और खैर पेड़
तराई केंद्रीय वन प्रभाग की भांखड़ा रेंज की बेलबाबा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले लगभग 121 हेक्टेयर के क्षेत्र में सागौन और खैर पेड़ लगे थे। सागौन व खैर के इन हजारों पेड़ों को वन निगम ने अपने व्यापार का जरिया बना लिया। जबकि भीषण गर्मी में यह पेड़ न केवल शहर को शुद्ध हवा प्रदान करते थे, बल्कि वन्य जीवों व पशु-पक्षियों के लिए भी बेहद उपयोगी थे।
अब इतने बड़े क्षेत्र में उजाड़ जैसी स्थिति दिख रही है। वर्ष 2025 में मानसून के बाद इन पेड़ों को काट दिया गया था। वन विभाग का दावा है कि कमर्शियल प्लांटेशन के तहत यह पेड़ काटे गए। इससे लगभग 73 करोड़ 10 लाख रुपये की आय हुई थी। वन निगम की ओर से इसकी रायल्टी वन विभाग को भी दी गई है।
इस तरह की स्थिति से विकास बनाम विनाश की बहस में पर्यावरणविद् और स्थानीय लोग नाखुश हैं और कहते हैं कि जलवायु परिवर्तन की समस्या से हर कोई जूझ रहा है। ऐसे में पेड़ों को काटने का सीधा असर पर्यावरण पर पड़ रहा है।
भूजल रिचार्ज पर भी पड़ने लगता है असर
पर्यावरणविद् प्रो. अजय रावत के अनुसार जब किसी इलाके से बड़ी संख्या में पेड़ों को काटा जाता है तो वहां के मौसम में बदलाव होता है। गर्मी बढ़ती है। बारिश का पैटर्न बदलता है। भूजल रिचार्ज पर फर्क पड़ता है।
तभी तो वर्तमान में हम देख रहे हैं कि वर्षा और बर्फबारी में देरी हो रही है। पहले जंगलों में चालखाल बनाने की जरूरत नहीं होती थी, अब जानवरों की प्यास बुझाने के लिए उन्हें बनाना पड़ रहा है। पेड़ों के कटने से पक्षियों और जानवरों के आवास भी प्रभावित होते हैं। इससे मानव वन्यजीव संघर्ष बढ़ने का खतरा रहता है।
समाज के प्रति जिम्मेदारी जरूरी : अजय रावत
पर्यावरणविद् अजय रावत वन विकास निगम और उसके अस्तित्व में आने से पहले जंगलों से लकड़ी काटने वाले ठेकेदारों की कार्यप्रणाली में भी साफ अंतर समझाते हैं। वह बताते हैं कि पूर्व में लकड़ी के बड़े ठेकेदार दान सिंह मालदार हों या पिथौरागढ़ के चंद साहब लकड़ी के व्यापार से होने वाली कमाई का एक हिस्सा समाजसेवा के कार्यों में लगाते थे।
टिंबर किंग दान सिंह मालदार ने नैनीताल में डीएसबी कालेज के निर्माण के लिए 12 एकड़ जमीन, भवन और 11 लाख रुपये दिए थे। इसी तरह वे गरीब घरों की बच्चियों की शादी भी करवाते थे। लेकिन वन निगम की समाज के प्रति जिम्मेदारी नहीं दिखती है, जो बेहद जरूरी है।
केंद्र सरकार की तरफ से मंजूर वर्किंग प्लान के तहत प्लांटेशन में पेड़ों को काटा जाता है। इससे सरकार को राजस्व प्राप्त होता है। इस डिवीजन ने सरकार को एक अरब से अधिक का राजस्व दिया है। बेल बाबा क्षेत्र के सामने पिछले वर्ष वर्किंग प्लान के अनुसार ही पेड़ काटे गए। वह जंगल का हिस्सा नहीं है। इस वर्ष मानसून में वहां फिर से पौधे लगाए जाएंगे। – यूसी तिवारी, डीएफओ, तराई केंद्रीय डिवीजन
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