हल्द्वानी। पहाड़ के संपन्न गांवों में शुमार रहा भिने आज अपनी खामोशी में डूबा हुआ है। शानदार बाखलियां और बड़े-बड़े खेत अपनों के इंतजार में खड़े हैं। सौ परिवारों वाला यह गांव चार चूल्हों तक सिमट गया है। भिने उन गांवों की फेहरिस्त में शामिल है, जिनके काम न तो उसके नौलों-धारों का पानी आया और ना ही उसकी नौजवान पीढ़ी।
अल्मोड़ा जिले की सिमलधार ग्राम पंचायत तीन गांवों से मिलकर बनी है। इनमें से एक भिने गांव तक आज भी सड़क सुविधा नहीं है। जहां कभी हर आंगन से उठता चूल्हे का धुआं जीवन का संकेत देता था, वहां अब गिने-चुने घरों में ही रसोई जलती है। गांव तक पहुंचने के लिए ढाई किलोमीटर का जंगल का दुर्गम रास्ता तय करना पड़ता है, जो रोजमर्रा की जिंदगी को कठिन बना देता है। बीमारों, बुजुर्गों और महिलाओं के लिए यह रास्ता किसी जोखिम से कम नहीं। यही वजह है कि बेहतर जीवन की तलाश में युवा पीढ़ी गांव छोड़कर शहरों की ओर जा चुकी है।
भिने गांव में कभी जीवन का आधार रहे प्राकृतिक जलस्सोत सूखने से पानी का संकट भी है। सरकारी लिफ्ट योजना से घरों तक नल ताे पहुंच गए लेकिन इसे भरोसे न तो खेती हो सकती है और न रिवर्स पलायन। प्राकृतिक जलस्रोतों के खत्म होने से खेती पर सीधा असर पड़ा है। जो खेत कभी लहलहाते थे, वे अब बंजर होते जा रहे हैं। ऊपर से जंगली जानवरों के बढ़ते उत्पात ने खेती को और मुश्किल बना दिया है जिससे लोगों की आजीविका छिन गई। रूद्रपुर में रह रहे गांव के निवासी हरीश चंद्र सती बताते हैं कि गांव के सभी तोक अब भी सड़कों से नहीं जुड़े हैं जिससे यहां रहना युवाओं के लिए मुश्किल हो गया है। रोजगार, शिक्षा और सुविधाओं के अभाव में वे गांव में भविष्य नहीं देख पा रहे। पानी की समस्या का समाधान हो जाता तो शहरों को गए लोग थोड़े समय के लिए ही सही, अपने घरों को आगाद करने आ सकते थे।
भिने गांव के बचे हुए लोग सड़क और पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं की आस लगाए बैठे हैं। उन्हें भरोसा है कि अगर ये सुविधाएं मिल जाएं, तो एक दिन गांव के सूने आंगन फिर से आबाद हो सकते हैं।
जिनकी उम्मीदों पर जिंदा है गांव…
भिने गांव आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां उम्मीदें अब भी जिंदा हैं, लेकिन हालात चुनौतीपूर्ण हैं। यहां जोगाराम, दामू राम और गोपाल राम जैसे कुछ हिम्मती लोगों के ही परिवार बचे हैं। चार अनुसूचित जाति के परिवार और दो सवर्ण परिवारों के बुजुर्ग गांव को मरने से बचाए हुए हैं। ये लोग तमाम मुश्किलों के बावजूद अपनी जमीन और जड़ों से जुड़े हुए हैं। उन्हें अब भी उम्मीद है कि हालात बदलेंगे और एक दिन गांव फिर से आबाद होगा।
ग्रामीण, परूली देवी ने बताया कि गांव में बस बुजुर्ग और कुछ परिवारों की महिलाएं रह गई हैं। पहले से लोग दूसरों को खेत साैंपकर जाते थे तो हरे-भरे रहते थे। अब जंगली जानवरों के उतपात की वजह से लोग अपने खेत भी बंजर छोड़ रहे हैं।
ग्रामीण, गिरीश चंद्र सती ने बताया कि अपने आबाद गांव को धीरे-धीरे वीरान होते देखा है। ऐसी हालत भी नहीं है कि यहां रहा न जा सके लेकिन खेती कम होने से घर चलाना मुश्किल हुआ है। ऐसे में रोजगार के विकल्प ढूंढने युवा शहरों में जा बसे हैं, जो शायद ही कभी लौटें।
ग्राम प्रधान खीम सिंह ने कहा कि युवा गांव की जिंदगी और शहरी जीवन की तुलना करते हैं तो उन्हें महानगरों की चकाचाैंध खींच ले जाती है। जिनके पास बड़े खेत हैं वो भी शहरों में जा बसे हैं। पता नहीं ये सिलसिला कब रुकेगा। सिमलधार ग्राम पंचायत के कुछ तोक सड़कों से जुड़ गए हैं। गांव के पास सरकारी स्कूल भी है। शहरी जीवन के आगे लोगों को ये काफी कम लगता है।

