ईरान संकट में कहां गए मुस्लिम ब्रदरहुड का नारा लगाने वाले

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ईरान पर हमले को लेकर मुस्लिम वर्ल्ड में जिस तरह का कन्फ्यूजन देखा गया है, वह अपने आप में अलग किस्म का फेनोमिना है. एक तरफ ईरान के समर्थन के लिए कहीं से भी कोई इस्लामी मुल्क साथ नहीं दिखाई दिया. वहीं दूसरी तरफ दुनिया भर के मुस्लिम शिया-सुन्नी की दीवार तोड़कर ईरान के साथ दिल से खड़े हैं. दुनिया के सभी इस्लामी मुल्क एकजुट होकर ईरान के साथ खड़े हुए होते तो शायद युद्ध की नौबत ही नहीं आती. जबकि पाकिस्तान और भारत के साथ ऑपरेशन सिंदूर के समय तुर्किए ने खुलकर पाकिस्तान के लिए मुस्लिम भाईचारा दिखाया था. हालांकि टर्की को छोड़कर कोई अन्य मुस्लिम देश पाकिस्तान के साथ नहीं आया था. पर ईरान के लिए तो एक भी मुस्लिम देश खुलकर उसके साथ खड़ा होता नहीं दिखा. 

दुनिया के मुसलमानों का स्वयंभू नेता बनने वाला और अपने परमाणु बम को इस्लामी बम बोलने वाला पाकिस्तान भी ईरान से दूरी बनाता नजर आया. इतना ही नहीं अंदरखाने से यह भी खबर आई है कि पाकिस्तान ने युद्ध बढने पर अमेरिका को अपने एयर बेस और अन्य संसाधनों को इस्तेमाल की खुली छूट देने का वादा भी किया है.

शायद यही कारण रहा ईरान को भी मुस्लिम देशों पर आक्रमण करने में कोई संकोच नहीं आया. रविवार के बाद सोमवार को भी मिडिल ईस्ट के दुबई, बहरीन, शारजाह, अबू धाबी आदि में ईरान ने जमकर बम गिराए हैं. मंगलवार को भी ईरान मुस्लिम देशों पर कहीं भी रहम करते हुए नजर नहीं आ रहा है. यानि कि मुस्लिम भाईचारा की बात ही बेमानी हो गई है. ईरान पर हमले के लिए मुस्लिम देश अमेरिका को बेस उपलब्ध करा रहे हैं और ईरान अपने मुस्लिम भाइयों पर बम गिराने से बाज नहीं आ रहा है. कुल मिलाकर इस यु्द्ध में मुसलमान ही मुसलमान को ठोंकता नजर आ रहा है.  मुस्लिम बंधुत्व का सच अब केवल दिखावे के लिए ही दिख रहा है. 

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28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजराइल ने ईरान पर बड़े पैमाने पर हमला किया. ऑपरेशन ‘एपिक फ्यूरी’ और ‘रोरिंग लायन’ के तहत तेहरान के न्यूक्लियर साइट्स, मिसाइल बेस और सुप्रीम लीडर अली खामेनेई का कंपाउंड निशाना बना. खामेनेई की मौत की पुष्टि हुई, साथ ही दर्जनों IRGC कमांडर मारे गए. ईरान ने तुरंत जवाबी हमले शुरू किए. इजराइल पर बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं और अमेरिकी बेस पर हमले किए, जो बहरीन, कतर, यूएई, कुवैत, जॉर्डन और सऊदी अरब में स्थित थे. इन हमलों से गल्फ देशों में नागरिक इलाकों में भी जबरदस्त नुकसान हुआ है. ईरानी हमलों के चलते सऊदी स्थिति दुनिया की सबसे बड़ी रिफायनरी को बंद कर दिया गया है. हवाई अड्डे बंद हो गए हैं और तेल की कीमतें आसमान छूनी शुरू हो गईं हैं.लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि मुस्लिम दुनिया में एकजुटता की कोई झलक नहीं दिखी. 

सऊदी अरब, यूएई, बहरीन, कतर, कुवैत और जॉर्डन ने ईरान के जवाबी हमलों की कड़ी निंदा की. इन देशों ने संयुक्त बयान जारी कर कहा कि ईरान की निंदा की हैं. सऊदी विदेश मंत्रालय ने कहा कि वे इन देशों के साथ पूर्ण एकजुटता में हैं और जरूरत पड़ने पर मदद करेंगे. अरब लीग (22 देशों की) ने भी ईरान के हमलों को शांति और स्थिरता के पक्षधर देशों की संप्रभुता का उल्लंघन बताया. पाकिस्तान ने भी दोहरी प्रतिक्रिया दी. शुरू में ईरान पर हमले को अनुचित बताया, लेकिन ईरान के गल्फ देशों पर हमलों की कड़ी निंदा की और सऊदी अरब, यूएई आदि के साथ पूर्ण एकजुटता दिखाई. 

पाकिस्तानी पीएम शहबाज शरीफ ने कहा कि पाकिस्तान इन भाईचारे वाले देशों के साथ खड़ा है. जॉर्डन, सीरिया और मोरक्को ने भी ईरान के हमलों की निंदा की. तुर्की में कुछ विरोध प्रदर्शन हुए, लेकिन सरकारी स्तर पर कोई मजबूत एकजुटता नहीं दिखी. हमास और हिजबुल्लाह ने ईरान के प्रति सहानुभूति जताना और मुस्लिम एकता की बात करना स्वाभाविक है. लेकिन ईरान के साथ  वे खुद कमजोर हो चुके हैं. हूती और कुछ इराकी मिलिशिया ने भी समर्थन दिखाया, लेकिन कोई बड़ा सैन्य या राजनीतिक मोर्चा नहीं बन सका. यह कन्फ्यूजन इसलिए अलग है क्योंकि मुस्लिम दुनिया में “उम्माह” (एकजुट मुस्लिम समुदाय) का नारा हमेशा जोर-शोर से लगता रहा है.फिलिस्तीन, कश्मीर या अन्य मुद्दों पर इसे समर्थन मिलता रहा है. लेकिन यहां ईरान, जो खुद को इस्लामी क्रांति का नेता बताता है, वो अकेला पड़ गया है. 

क्यों मुस्लिम देश एकजुट नहीं हो पा रहे हैं

ईरान शिया-प्रधान है. अधिकांश अरब देश सुन्नी हैं. ईरान ने पिछले दशकों में इराक, सीरिया, यमन, लेबनान में शिया प्रॉक्सी के जरिए प्रभाव बढ़ाया, जिससे सुन्नी देशों में डर पैदा हुआ. सऊदी-अरब और ईरान के बीच कोल्ड वॉर बहुत पहले चल रहा था. ईरान के हमलों ने गल्फ देशों को सीधे निशाना बनाया, जिससे वे अमेरिका-इजराइल के करीब आ गए.

गल्फ देशों की अर्थव्यवस्था तेल, निवेश और अमेरिकी सुरक्षा पर टिकी है. ईरान के साथ एकजुट होने से उनका व्यापार, सुरक्षा और स्थिरता खतरे में पड़ती है. सऊदी और यूएई पहले ही इजराइल से सामान्यीकरण (Abraham Accords) की राह पर हैं.

तुलना करें तो 2025 में भारत-पाकिस्तान संघर्ष के दौरान तुर्की ने पाकिस्तान के साथ खुलकर खड़े होने का दिखावा किया. कुछ रिपोर्ट्स में तुर्की के हथियार और ड्रोन पाकिस्तान पहुंचने की बात भी आई (हालांकि आधिकारिक तौर पर तुर्की ने इनकार किया). तुर्की और पाकिस्तान दोनों ही सुन्नी देश हैं. ईरान के मामले में शिया-सुन्नी विभाजन, प्रॉक्सी युद्ध और क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता हावी होने के चलते मुस्लिम भाईचारे की बात आगे नहीं बढ़ पाई है.

इसके साथ ईरान ने भी अतीत में मुस्लिम देशों पर हमले किए हैं.यमन में हूती के जरिए सऊदी पर, इराक में मिलिशिया के जरिए, सीरिया में असद को बचाने के लिए लगातार ईरान ने ऐसा रवैया दिखाया है जो कहीं से मुस्मिम बंधुत्व वाला नहीं रहा है. शायद यही कारण है कि जब ईरान की बारी आई, तो उसके लिए भी दुनिया में कोई भाईचारा नहीं दिख रहा है. यह घटना मुस्लिम बंधुत्व के दिखावे की पोल पट्टी उजागर करती है. उम्माह का नारा चुनिंदा मुद्दों पर लगता है ,जब इजराइल या पश्चिम दुश्मन हो. लेकिन जब मुस्लिम देश आपस में टकराते हैं, तो हित, संप्रदाय और शक्ति संतुलन हावी हो जाता है. 

ईरान गल्फ पर हमला कर रहा है, सऊदी-अरब अमेरिका के साथ खड़ा है, पाकिस्तान दोनों तरफ बैलेंस कर रहा है. 2026 का यह संकट दिखाता है कि मुस्लिम दुनिया में भाईचारा के लिए कोई जगह नहीं, बल्कि यह अवसरवादी राजनीति का एक हिस्सा है. जहां हित मिलते हैं, वहां बंधुत्व की बात की जाती है. 

मुस्लिम ब्रदरहुड कभी स्वीकार्य नहीं रहा इस्लामी देशों को

मुश्किल कंट्रीज एक तरफ तो मुस्लिम देशों के बीच इस्लामिक भाइचारा नहीं कायम कर सके हैं. दूसरी तरफ इस विचारधारा वाली राजनीति को भी किसी भी मुस्लिम देश में तवज्जो नहीं मिली है. बल्कि इस तरह की विचारधारा वाली पार्टी को प्रतिबंधित या आतंकवादी संगठन घोषित किया गया है. 1928 में मिस्र में स्थापित यह संगठन राजनीतिक इस्लाम का प्रमुख प्रतीक रहा, लेकिन कई मुस्लिम-बहुल देशों ने इसे खतरे के रूप में देखा. इसका सबसे मुख्य कारण यह रहा कि इस तरह के दल वहां की राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ खतरे के रूप में सामने आते हैं. ब्रदरहुड की विचारधारा (शरिया-आधारित राज्य, खलीफा जैसी व्यवस्था) राजशाही और सत्ताधारी शासनों के लिए चुनौती बनती है. वे इसे धर्म के नाम पर विभाजन फैलाने वाला मानते हैं. 2013 में मिस्र में मोहम्मद मूर्सी की सरकार गिरने के बाद अल-सिसी ने इसे आतंकवादी घोषित किया, हजारों सदस्य जेल गए.  2014 में  सऊदी में प्रतिबंधित हुआ क्योंकि यह “धार्मिक विचलन” और “विभाजनकारी” माना गया. सऊदी उलेमा ने इसे इस्लाम के सच्चे रास्ते से अलग बताया.
इसी तरह संयुक्त अरब अमीरात (UAE) में 2014 से बैन है. इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा माना गया है. अप्रैल 2025 से जार्डन में पूरी तरह प्रतिबंधित है. हिंसा और विरोध के चलते बहरीन, सीरिया में पहले से बैन.रूस, केन्या आदि ने भी इसे आतंकवादी संगठन घोषित किया है.
ब्रदरहुड को इस्लामी देशों में व्यापक मान्यता नहीं मिली. यह विरोधी भूमिका में मजबूत रहा, लेकिन सत्ता पाने में कभी सफल नहीं हो सका.

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