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Who is Hetal Waria? Have you worked on Ranbir's voice in 'Ramayana'? Told the presence of dialect coach on the set is necessary
By: Amar Ujala
Published: 28 October 2026
Photo / Illustration: Haldwani Times News Desk
<p>रामायण फिल्म - फोटो : इंस्टाग्राम ‘रणबीर खुद को अच्छी तरह समझते हैं’ रणबीर के साथ काम करने के अनुभव पर हेतल कहती हैं, ‘रणबीर बहुत मेहनती अभिनेता हैं। उनकी एक बात मुझे सबसे अच्छी लगी। वह खुद को अच्छी तरह समझते हैं और बेहतर सीखने के लिए पुरानी आदतों को छोड़ने के लिए भी तैयार रहते हैं। वह एक अभिनेता के तौर पर खुद को समझते हैं और अपने बोलने के तरीके को लेकर भी जागरूक हैं।’</p>
<p>रणबीर कपूर - फोटो : सोशल मीडिया 'राम’ के लिए आवाज में बदलाव, रणबीर की पहचान मिटाना नहीं था रणबीर ने ‘रॉकस्टार’, ‘संजू’ और ‘एनिमल’ जैसी फिल्मों में अलग-अलग तरह के किरदार निभाए हैं। दर्शकों के मन में इन किरदारों के साथ उनकी आवाज और बोलने के अंदाज की भी एक छवि बनी है। हेतल के मुताबिक, राम का किरदार निभाते समय उस छवि से अलग सोचने की जरूरत थी। हेतल कहती हैं, 'किसी कलाकार की पहचान मिटाना हमारा मकसद नहीं होता। हम उसकी आवाज को किरदार की जरूरत के हिसाब से ढालने में मदद करते हैं। इसे पहचान मिटाने के बजाय उसमें कुछ नया जोड़ने की प्रक्रिया समझना चाहिए। इससे किरदार को बेहतर बनाने की मजबूत नींव तैयार होती है। आवाज के कई पहलू होते हैं, जैसे उसकी गहराई, गूंज, लहजा, शब्दों का उच्चारण और उतार-चढ़ाव। किरदार की जरूरत के मुताबिक हम आवाज में गहराई, ठहराव या गर्माहट लाने पर काम कर सकते हैं। लेकिन सिर्फ आवाज भारी होने से अभिनय दमदार नहीं हो जाता। राम के किरदार के लिए आवाज ऐसी होनी चाहिए, जो किरदार और निर्देशक की सोच के मुताबिक हो। वह स्वाभाविक लगे, बनावटी या जरूरत से ज्यादा भारी नहीं। दर्शकों का ध्यान किरदार पर जाना चाहिए, न कि इस बात पर कि कलाकार अपनी आवाज के साथ क्या तकनीक अपना रहा है। इसमें स्क्रिप्ट और संवादों की भाषा भी अहम है। भाषा ऐसी होनी चाहिए, जो कहानी की दुनिया और किरदार की असलियत को बनाए रखे, साथ ही आज के दर्शकों को भी आसानी से समझ आए। संवाद ऐसे लगने चाहिए, जैसे किरदार स्वाभाविक रूप से अपनी बात कह रहा हो, न कि लिखी हुई पंक्तियां पढ़ रहा हो। इसके लिए शब्दों के उच्चारण और आवाज के उतार-चढ़ाव पर ध्यान देना जरूरी है।'</p>
<p>रामायण फिल्म - फोटो : सोशल मीडिया रणबीर की अलग आवाज सुनकर उलझन में पड़ गया कुत्ता इस वॉयस ट्रेनिंग के दौरान का मजेदार वाकया सुनाते हुए हेतल ने कहा, ‘जब रणबीर राम की आवाज में बोलने का अभ्यास करते थे, तो कई तरह की आवाजें निकालते थे। इस दौरान उनका कुत्ता उलझन में पड़ जाता था। वह रणबीर की सामान्य आवाज सुनने का आदी था, इसलिए उनके बोलने का बदला हुआ अंदाज उसे हैरान करता था। यह एक मजेदार और प्यारा पल था।'</p>
<p>हेतल वारिया - फोटो : इंस्टाग्राम@hetalvariaofficial आवाज की ट्रेनिंग में क्या होता है? हेतल बताती हैं कि ट्रेनिंग का तरीका स्क्रिप्ट और उपलब्ध समय के हिसाब से तय होता है। कभी सीधे संवादों पर काम किया जाता है, तो कभी कुछ अभ्यासों के जरिए शुरुआत होती है। वह कहती हैं, ‘हम आम तौर पर हफ्ते में एक या दो बार मिलते थे। हर सेशन करीब एक घंटे का होता था। मेरा तरीका स्क्रिप्ट और उपलब्ध समय पर निर्भर करता है। अगर समय कम हो, तो मैं स्क्रिप्ट पर काम करती हूं। अगर ज्यादा समय हो, तो शुरुआत कुछ हल्के-फुल्के अभ्यासों से करना पसंद करती हूं। फिर धीरे-धीरे बोली और स्क्रिप्ट पर आते हैं।’ वह आगे कहती हैं, ‘आवाज पर काम करने में सांस, शरीर, शब्दों का उच्चारण, आवाज में उतार-चढ़ाव और बोलते समय अपनी मौजूदगी बनाए रखना शामिल है। मुंह का आकार, शरीर को रखने का तरीका और सांस लेने का ढंग भी आवाज पर असर डालते हैं। इसके लिए कई तरह के अभ्यास किए जाते हैं। इनमें मुंह के आकार को बदलना, सांस पर काम करना और शब्दों को साफ बोलने का अभ्यास शामिल है। आवाज में फुर्ती लाने के लिए स्ट्रॉ का इस्तेमाल भी किया जाता है। शरीर की मुद्रा बदलकर यह समझने की कोशिश होती है कि उसका आवाज पर क्या असर पड़ता है।'</p>
<p>‘क्षमा’ शब्द पर भी हुई चर्चा हेतल बताती हैं कि कुछ शब्दों को बोलने के तरीके पर खास ध्यान देना पड़ता है। राम के किरदार की तैयारी के दौरान ‘क्षमा’ शब्द पर भी चर्चा हुई। वह कहती हैं, ‘क्षमा उन शब्दों में से एक था, जिस पर हमने चर्चा की। ऐसे शब्दों में उच्चारण अहम है। एक शब्द को एक से ज्यादा तरीकों से बोला जा सकता है। बोली की खूबसूरती भी यही है। ध्यान देना होता है कि अलग-अलग ध्वनियां किस तरह जुड़ती हैं और शब्द पूरे वाक्य में कैसे बोला जाता है।’ वह आगे कहती हैं, ‘उच्चारण का मतलब सिर्फ शब्दों को सही बोलना नहीं है। जरूरी यह भी है कि ध्वनियां सही तरीके से निकलें और शब्द संवाद, वाक्य या विचार में स्वाभाविक लगें। बोलने का अंदाज स्वाभाविक बनाने के लिए अभ्यास जरूरी है।’</p>
<p>‘सेट पर भी मिले कलाकारों को सही मार्गदर्शन’ वह आगे कहती है, 'कलाकार फिल्म की तैयारी के दौरान किसी बोली पर काफी काम कर सकता है, लेकिन शूटिंग का माहौल अलग होता है। वहां भावनाएं, शारीरिक गतिविधियां, अचानक किए गए बदलाव और कई दूसरी चीजें संभालनी होती हैं। ऐसे में बोली के उच्चारण में गलती होना स्वाभाविक है। कई बार कलाकार को सीन के दौरान एक छोटे से सुधार या याद दिलाने की जरूरत पड़ सकती है। अगर डायलेक्ट कोच सेट पर मौजूद हों, तो इन छोटी-छोटी गलतियों को तुरंत ठीक किया जा सकता है। इससे किरदार के बोलने के अंदाज में एकरूपता बनी रहती है और कलाकार के अभिनय को भी मदद मिलती है। मैं इस काम करने के तरीके में बदलाव देखना चाहती हूं। पश्चिमी देशों में फिल्म निर्माण के दौरान विशेषज्ञों की मदद जिस तरह ली जाती है, उससे भी सीखने की जरूरत है। डायलेक्ट कोचिंग को सिर्फ फिल्म की शूटिंग शुरू होने से पहले की तैयारी तक सीमित नहीं रखना चाहिए। प्री-प्रोडक्शन से लेकर पोस्ट-प्रोडक्शन तक, कलाकार के प्रदर्शन के हर चरण में इसकी जरूरत हो सकती है।'</p>