हल्द्वानी में जंगलों में आग लगने का खतरा गंभीर हो गया है। वन विभाग के अनुसार, नमी का स्तर 40% से कम हो गया है और चीड़ की सूखी पत्तियां गिर रही हैं। इन पत्तियों में ज्वलनशील तत्व होते हैं, जिससे आग तेजी से फैल सकती है। वन विभाग ने आग की सूचना के लिए हेल्पलाइन नंबर 1926 जारी किया है।

मोहन भट्ट, हल्द्वानी। अप्रैल के तीसरे हफ्ते से ही जंगलों में आग लगने का खतरा गंभीर रूप ले चुका है। वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, जंगलों में नमी का स्तर 40 प्रतिशत से भी कम हो गया है। लगातार तेज धूप ने न सिर्फ जंगल की घास-फूस को पूरी तरह सुखा दिया है, बल्कि पर्वतीय इलाकों में चीड़ के पेड़ों की सूखी पत्तियां (पिरुल) भी भारी मात्रा में गिरने लगी हैं, जिससे आग फैलने का खतरा दोगुना हो गया है। विभाग ने सभी रेंज में मौसम मापक यंत्र लगाए हैं। इनकी मदद से क्षेत्र विशेष का तापमान, आर्द्रता, वायु दबाव, हवा की गति, फ्यूल मॉडल और फायर डेंजर रेटिंग जैसी महत्वपूर्ण जानकारी जुटाई जा रही है।
यह जानकारी सीधे डीएफओ कार्यालय में बने मास्टर कंट्रोल रूम को भेजी जाती है, जहां से इसे मुख्यालय तक पहुंचाया जाता है। इसके आधार पर मुख्यालय स्तर से आवश्यक दिशा-निर्देश जारी किए जाते हैं।चीड़ की सूखी पत्तियां वनाग्नि के लिए खतरनाकवन विभाग की नजर विशेष रूप से आबादी वाले इलाकों से सटे चीड़ के घने जंगलों पर है। वन अधिकारियों के मुताबिक, चीड़ की सूखी पत्तियां पगडंडियों से लेकर मुख्य मार्गों तक पसर जाती हैं। इनमें तारपीन के तेल जैसे ज्वलनशील तत्वों की उच्च मात्रा होती है। सूखने के बाद ये पत्तियां हल्की, पतली और हवादार हो जाती हैं, जिससे ऑक्सीजन मिलते ही आग बहुत तेजी से फैलती है और पेट्रोल की तरह काम करती है। पिरुल पर लगी छोटी सी चिंगारी भी पूरे जंगल को खाक करने के लिए काफी होती है।वनाग्नि की सूचना के लिए 1926 पर करें फोनवन विभाग ने मानव-वन्यजीव संघर्ष, वनाग्नि, अवैध कटान, शिकार और वन भूमि पर अतिक्रमण आदि के लिए हेल्पलाइन नंबर 1926 जारी किया है। कोई भी व्यक्ति इस नंबर पर अपनी शिकायत या सुझाव दे सकता है।लगातार तेज धूप के कारण जंगल में नमी की मात्रा कम होने और चीड़ की सूखी पत्तियां गिरने से आग का खतरा बढ़ गया है। जन-जागरूकता अभियानों के जरिए लोगों को वनाग्नि से होने वाले नुकसान के प्रति सचेत किया जा रहा है। मातहतों को वनाग्नि को लेकर जारी निर्देशों का कड़ाई से पालन करने के निर्देश दिए गए हैं।- डॉ. तेजस्विनी पाटिल, मुख्य वन संरक्षक, कुमाऊ


