– 366 रूटों पर सेवा दे रहे केमू किराये और दड़बेनुमा दफ्तरों में संचालित
हैप्पी बर्थ डे केमू :
बृजेंद्र मेहता
हल्द्वानी, मुख्य संवाददाता। “मैं आपकी हमसफर-हमराह केमू हूं..आज 88 बरस की हो चुकी हूं। ”
मैंने 80 पैसे लीटर के डीजल को 100 रुपये तक बढ़ते देखा, एक रुपये के टिकट को 300-500 रुपये तक पहुंचते देखा, आग उगलने वाली“लोहे की भैंस” कहकर डरने वाले बच्चों को आज फर्राटा भरते ‘जेन जी’ होते देखा।
जी हां। यहां बात हो रही है कुमाऊं मोटर यूनियन यानी केमू की, जिसके प्रयासों से 14 अप्रैल 1939 को ही पहली दफा कुमाऊं की संकरी और घुमावदार सड़कों से बस के सफर की शुरूआत हुई थी। इसी केमू बस ने जहां देश की आजादी और भारत-पाक जंग के दिनों में पहाड़ के जांबाजों को मंजिल तक जाने में मदद की, वहीं लेह-लद्दाख की बर्फीली हवाओं से भेजे गए उनके मनीऑर्डर को मुनस्यारी-धारचूला के दूरस्थ गांवों तक भी पहुंचाये। नौ छोटी मोटर कंपनियों से मिलकर शुरू हुई यह सेवा आज भी कुमाऊं की “लाइफ लाइन” बनी हुई है। तब यह सिर्फ बस नहीं थी, बल्कि गांव और दुनिया के बीच का पहला भरोसा थी।
लेकिन, अब सरकारी उपेक्षा के चलते कुमाऊं के 366 रूटों पर दौड़ने के बाद भी केमू बसें यात्रियों की पहली पसंद नहीं बन पा रही है।
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आठ मील प्रति घंटे की रफ्तार से शुरू हुआ सफर
अल्मोड़ा, बागेश्वर, टनकपुर केमू स्टेशन इंचार्ज पद से रिटायर्ड ऐलन रे और मल्ला गोरखपुर निवासी पूरन बचखेती बताते हैं कि उस वक्त कुमाऊं की सड़कें खतरनाक थीं, जिस कारण केमू बसों की रफ्तार 8-10 मील प्रति घंटा रहती थी। हल्द्वानी से अल्मोड़ा 4-5 घंटे और बागेश्वर 10-12 घंटे में पहुंचा जाता था। बस में बकरियां, अनाज के बोरे, चिट्ठियां और ठहाके साथ चलते थे। ड्राइवर हीरो होते थे, और हर सफर एक रिश्ता जोड़ता था।
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‘अल्मोड़ा अंग्रेज आयो ‘केमू’ मैं’
सुपरहिट कुमाउनी गीत अल्मोड़ा अंगे्रज आयो टैक्सी हर किसी की जुबां पर अक्सर सुनाई देता है, लेकिन सच्चाई यह है कि पहली दफा अंग्रेज अल्मोड़ा केमू में पहुंचा था।
54 वर्षों से केमू बस संचालन कर रहे हल्द्वानी के पांडे नवाड़ निवासी चंद्रप्रकाश गुप्ता (75 वर्ष)
केमू की पहली सेवा हल्द्वानी से अल्मोड़ा के बीच, वाया रानीखेत शुरू हुई थी। अंग्रेज अफसर भी इस सफर का हिस्सा रहे। वहीं, करीब 55 वर्ष तक केमू संचालन से जुड़े हल्द्वानी निवासी आनंद सिंह मेहता (78 वर्ष) कहते हैं कि रोडवेज के आने तक भी केमू का सफर शानदार रहा।
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18 बसें थीं फिर भी घोड़ों में पिथौरागढ़ गई बारात
बड़ी मुखानी हल्द्वानी निवासी 77 वर्षीय ऊषा नयाल ने बताया कि अल्मोड़ा में उनके दादा चतुर सिंह बोरा की 18 केमू बसें हुआ करती थीं। उस वक्त अल्मोड़ा से पिथौरागढ़ तक सड़क नहीं थी। ऊषा के अनुसार 1948 में उनके दादा चतुर की बारात अल्मोड़ा के बिरौड़ा से पिथौरागढ़ तक पैदल और घोड़ों में गई थी, बारात को आने-जाने में ही 15 दिन लग गये थे। उस वक्त अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ के बीच सड़क नहीं बनीं थी।
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पंत की सोच से नौ लोगों ने शुरू की कंपनी
यूपी के प्रथम मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत की सोच से बिखरी परिवहन व्यवस्था को एकजुट किया गया। केमू के नौ सदस्यों ने मिलकर इसकी स्थापना और संचालन शुरू किया। इनमें जे.वॉगन पृथ्वी नाथ, ई.जे. फौंसिका, सरदार इंदरजीत सिह भसीन, भवानी दत्त चंदोला, अश्विनी दास साह, शिबलाल साह, गुसैं सिंह, उर्बादत्त जोशी केमू को मजबूती देने में अहम रोल निभाया। उस वक्त केमू का प्रबंधन अंग्रेज फौंसिका के हाथों में था।
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भरोसे का दूसरा नाम—केमू : चड्ढ़ा
हल्द्वानी निवासी अमरीक सिंह चड्ढा (78) बताते हैं कि उनके पिता हरवंश चड्ढा केमू के संस्थापक सदस्यों में थे। शुरुआती दौर में उनके पास 16 केमू बसें हुआ करती थी। वह याद करते हैं कि 18 साल की उम्र में उन्होंने खुद हल्द्वानी से अल्मोड़ा तक बस चलाई थी, जब एक ड्राइवर की तबीयत बिगड़ गई थी।
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केमू का दर्द : किराये के स्टेशन, जर्जर भवनों में चल रहे दफ्तर
– 366 रूटों पर सेवाएं दे रही केमू दे रही केमू
– रोजाना छह हजार यात्रियों को अब भी दे रहा सेवा
हल्द्वानी। केमू भले ही आजादी से पहले से कुमाउवासिंयों को सेवाएं दे रही हो, लेकिन सरकारी उपेक्षा के चलते इस सेवा के संचालन से पुराने लोग लगातार छूटते जा रहे हैं।
देश की आजादी के पहले से बने हल्द्वानी और अल्मोड़ा के पुराने कार्यालय जर्जर हो चुके हैं। काठगोदाम का नरीमन चौराहा कार्यालय कोर्ट में मामला लंबित होने के कारण खस्ताहाल है। बावजूद इसके अब भी केमू के 301 रूट काठगोदाम और 65 रूट रामनगर डिपो से संचालित हो रहे हैं। वहीं, बागेश्वर, रानीखेत, गरुड़ और गंगोलीहाट में किराये के भवनों से काम चल रहा है। केमू के ईडी हिम्मत सिंह नयाल के अनुसार, सरकार से जमीन की मांग कई बार की गई, लेकिन सुनवाई नहीं हुई। डग्गामारी और अव्यवस्था के कारण यात्री भी लगातार कम हो रहे हैं।

